नई दिल्ली ,08 मार्च । भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच बैंकों से फॉरेक्स सौदों से जुड़े ग्राहकों के लेन-देन और पोजीशन की विस्तृत जानकारी मांगी है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं बड़े स्तर पर भारतीय रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी तो नहीं हो रही है।
पिछले छह महीनों के दौरान रुपये में डॉलर के मुकाबले काफी कमजोरी देखी गई है। इस अवधि में रुपया करीब 88 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से गिरकर 92 रुपये के आसपास तक पहुंच गया था। शुक्रवार को भी रुपया 91.74 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। आरबीआई बाजार में बढ़ती अस्थिरता को नियंत्रित करने और स्थिति की सही तस्वीर समझने के लिए यह कदम उठा रहा है।
इन कारणों से बढ़ा रुपये पर दबाव
विशेषज्ञों के अनुसार रुपये में गिरावट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। बड़े कॉरपोरेट घराने भविष्य के आयात के लिए पहले से डॉलर की खरीद कर रहे हैं। इसके अलावा ऑफशोर नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (हृष्ठस्न) और फॉरवर्ड मार्केट में आर्बिट्राज डील्स भी बढ़ी हैं। वहीं बैंक भी अपनी तय सीमा के भीतर ट्रेडिंग पोजीशन बढ़ा रहे हैं, जिससे बाजार में दबाव बढ़ रहा है।
इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान-इजरायल और अमेरिका से जुड़ी परिस्थितियां, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, चालू खाता घाटा और विदेशी निवेश प्रवाह में कमी भी रुपये की कमजोरी की प्रमुख वजह मानी जा रही हैं। हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुई व्यापारिक समझौते से कुछ राहत जरूर मिली थी, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण फिर से दबाव बढ़ गया है।
बैंकों को देनी होगी यह जानकारी
आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे स्पॉट, फॉरवर्ड और ऑफशोर हृष्ठस्न बाजार में ग्राहकों के लेन-देन का पूरा ब्योरा दें। विशेष रूप से 10 मिलियन डॉलर से अधिक के सौदों में ग्राहक का नाम और डॉलर खरीदने या बेचने का उद्देश्य बताना जरूरी होगा। इसके अलावा बैंकों को अपनी ओपन पोजीशन और इंटर-बैंक बाजार में कुल खरीद-बिक्री की जानकारी भी देनी होगी।
आरबीआई को मिलेगी रणनीति बनाने में मदद
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आंकड़ों से आरबीआई को बाजार में हो रही गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। इससे केंद्रीय बैंक रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए समय रहते उचित कदम उठा सकेगा।
बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जब आरबीआई इस प्रकार का डेटा मांगता है तो इसे बाजार में सट्टेबाजी को सीमित करने के संकेत के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इस संबंध में कोई औपचारिक निर्देश जारी नहीं किया गया है।
फिलहाल आरबीआई किसी विशेष स्तर पर रुपये को बचाने की रणनीति नहीं अपना रहा है, लेकिन जरूरत पडऩे पर फॉरवर्ड मार्केट में बाय-सेल स्वैप जैसे उपायों के जरिए हस्तक्षेप किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव जारी रहता है और विदेशी निवेश कमजोर रहता है, तो आने वाले समय में भी रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
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