—-हमारी भाषिक विविधता ने एक दूसरे को किया है समृद्ध:- प्रो रमेश चंद्र शर्मा।
—- भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा को निरस्त करने की है आवश्यकता:- प्रोफेसर सुरेन्द्र दुबे।
—- केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार और बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारतीय भाषाओं का अंतर्सम्बन्ध विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी।
कुशीनगर, 12 मार्च (आरएनएस)। भारत एक भौगोलिक इकाई भर नहीं है बल्कि एक सांस्कृतिक सत्ता है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारत की आत्मा एक है। हमारे देश का हर व्यक्ति बहुभाषिक है। उक्त बातें केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के निदेशक प्रोफेसर हितेंद्र मिश्र ने केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार और बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारतीय भाषाओं का अंतर्सम्बन्ध विषय दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कही। प्रो हितेंद्र ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत को ही देखा जाए देखा जाए तो कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां 5 से कम भाषाएं बोली जाती हों। किंतु पूर्वोत्तर भारत में भाषा के कारण कभी विवाद की स्थिति नहीं बनी। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष और पूर्व कुलपति प्रोफेसर सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा को निरस्त करने की आवश्यकता है । भाषा का परिवार मूलक वर्गीकारण भारत को बांटने का एक उपक्रम है। भारत में केवल एक भाषा परिवार है, वह है भारतीय भाषा परिवार। भाषा संस्कृति से नाभिनालबद्ध है। जब हम अपनी भारतीय भाषा को बचाएंगे तभी अपनी संस्कृति भी बचा पाएंगे। संगोष्ठी का बीज वक्तव्य देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के भाषा विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो रमेश चंद्र शर्मा ने अपने वक्तव्य में भारतीय भाषाओं की विलक्षणता की तरफ संकेत किया। उन्होंने कहा कि बहुभाषिकता भारत की अनोखी विशेषता है। भारत की भाषाओं ने एक दूसरे को प्रभावित किया है। हमारी भाषिक विविधता ने एक दूसरे को समृद्ध किया है। भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण विशेषता है भाषाओं का सहअस्तित्व। भारत की भाषाओं में कॉन्टैक्ट और कन्वर्जन रहा है। हमारी भाषाओं की एक साझा विरासत है, उसमें एक खास तरह का नैरंतर्य है जो काल और स्थान से परे है। गौरतलब है कि पश्चिमी राष्ट्रवाद एक भाषा से जुड़ा है जबकि भारतीय राष्ट्र बहुभाषिकता से। संगोष्ठी में आए हुए अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो0 विनोद मोहन मिश्र ने किया। उद्घाटन सत्र का आभार ज्ञापन डॉ0 दीपक ने किया। संचालन संगोष्ठी के संयोजक प्रो0 गौरव तिवारी ने किया। द्वितीय सत्र भारतीय भाषाओं में अंतर्संबंध के स्वरूप पर केंद्रित था। इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए हैदराबाद से आए भारतीय भाषा समिति के समन्वयक ने प्रो आर एस सर्राजू ने कहा कि भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंध की चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि भारतीय भाषाओं की एक दूसरे के अर्थ को बताने वाले शब्दकोश बन गए हैं। पहले ऐसे शब्दकोश नहीं थे। तब एक दूसरे भारतीय भाषाओं का अर्थ जानने का माध्यम अंग्रेजी थी। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो0 उषारानी राव ने कहा कि साहित्य पर चिंतन होता रहा है, भाषाओं पर संगोष्ठी का आयोजित होना एक सुखद बात है। तुलना करने की अवधारणा पश्चिम से आई है। वाक शक्ति ही वह शक्ति है जो अभि व्यक्ति के रूप में भाषाओं में दिखती है। भाषाएं मानवीय संवेदना की अमूल्य उपलब्धि हैं। भाषाओं के अंतर्सम्बन्ध के विषय में ग्रियर्सन, मैक्समूलर, सुनीति मुखर्जी, सुकुमार सेन आदि भाषाविदों के विचारों का उल्लेख किया। हिन्दी समाज के सभी वर्गों की भाषा है, स्वतंत्रता आंदोलन के समय इसने हमें एक उद्देश्य के लिए लडऩा सिखाया। कन्नड़ और हिन्दी के अंतर्संबंधों पर विशेष चर्चा की। हिन्दी और कन्नड़ दो अलग भाषाएं होते हुए भी एक ही वृक्ष की दो शाखाएं हैं। इटावा से आए डॉ रमाकांत राय ने वैदिक साहित्य से सतत परंपरा में स्वाधीनता के बाद के भारत को ध्यान में रखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने भाषाओं के वर्गीकरण को अंग्रेजों की विभाजनकारी नीति का परिणाम माना और कहा कि इस धारणा को हटाकर एक परिवार भारतीय भाषा परिवार मानना चाहिए। यही सच्चाई है। उन्होंने समझाया कि न केवल भाषाई अपितु व्याकरणिक और अंकगणितीय पद्धति से भी भारत में आपस में व्यवहार होता है जो इसके एक होने का परिचायक है। संस्कृत के विभागाध्यक्ष डॉ0 सौरभ द्विवेदी ने कहा किभारत की भाषाओं की विविधता उसकी समृद्धि का परिचायक हैं। किन्तु मौलिक शोध, नवाचार, वैज्ञानिक सिद्धांतों के लेखन हेतु किसी भी भारतीय भाषा में न होना वास्तविक समस्या है। संपर्क भाषा और भारतीय भाषाओं का वर्तमान विरोध हमारी अज्ञानता का परिणाम है। भारत में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का सह-अस्तित्व 2 हजार वर्षों तक रहा है। आज भी हमें भारतीय भाषाओं के उसी सह-अस्तित्व की दिशा में बढऩा होगा। इस सत्र का संचालन डॉ आशुतोष तिवारी ने किया। इस संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों व महाविद्यालय के शिक्षकों ने प्रतिभाग किया।
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