लखनऊ 12 मार्च (आरएनएस )। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में 12 मार्च को हिंदी प्रकोष्ठ, बीबीएयू तथा उत्तर प्रदेश जैन विद्या शोध संस्थान, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में तीर्थंकर ऋषभदेव जन्म कल्याणक के अवसर पर ‘जैन दर्शन और साहित्य: समकालीन संदर्भ मेंÓ विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया गया।कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश जैन विद्या शोध संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो. अभय कुमार जैन, विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा, महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर एवं ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अनिल कुमार शुक्ला, हिंदी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल, जैन विश्व भारती संस्थान लाडनूं के प्रो. नलिन के. शास्त्री, हिन्दी विभाग बीबीएयू के विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष प्रो. राम पाल गंगवार तथा कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव मंचासीन रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय कुलगीत के पश्चात आयोजन समिति की ओर से अतिथियों और शिक्षकों को अंगवस्त्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश चंद्र नैनवाल ने किया।स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो. राम पाल गंगवार ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का अभिनंदन किया। इसके बाद प्रो. अभय कुमार जैन ने संगोष्ठी के उद्देश्य और रूपरेखा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म मनुष्य को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के हित में कार्य करने की प्रेरणा देता है। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के जीवन से जुड़े पहलुओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने ‘असि, मसि और कृषिÓ की अवधारणा का जिक्र किया और बताया कि ऋषभदेव ने मानव समाज को आजीविका और व्यवस्थित जीवन का मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि जैन धर्म अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व और आत्मसंयम जैसे मूल्यों पर आधारित है, जो व्यक्ति को नैतिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने जैन दर्शन के विभिन्न दार्शनिक पहलुओं का उल्लेख करते हुए उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म अहिंसा, क्षमा और करुणा के भाव को बढ़ावा देता है। साथ ही जैन जीवनशैली की कई परंपराएँ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी हैं, जैसे सूर्यास्त से पूर्व भोजन करना, शाकाहार अपनाना और सादगीपूर्ण जीवन जीना।प्रो. अनिल कुमार शुक्ला ने जैन दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धांत अनेकांतवाद पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि यह सिद्धांत विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और स्वीकार करने की प्रेरणा देता है, जिससे समाज में सहिष्णुता और संवाद की भावना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि जैन समाज शिक्षा, व्यापार, सामाजिक सेवा और संस्कृति के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति करते हुए समाज के विभिन्न वर्गों को जोडऩे का कार्य कर रहा है।प्रो. नलिन के. शास्त्री ने जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों की परंपराओं तथा आगम साहित्य की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन साहित्य केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को जड़ता से चेतना की ओर ले जाकर जीवन में नैतिकता, अहिंसा और आत्मअनुशासन का मार्ग दिखाता है।प्रो. पवन अग्रवाल ने जैन धर्म के सिद्धांत अपरिग्रह की प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बढ़ते भौतिकतावाद, संप्रदायवाद और भ्रष्टाचार के बीच यह सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपरिग्रह मनुष्य को सीमित आवश्यकताओं, संयमित जीवन और संसाधनों के संतुलित उपयोग की शिक्षा देता है, जिससे समाज में समरसता और संतुलित विकास को बढ़ावा मिलता है।संगोष्ठी के अंतर्गत प्रतिभागियों के लिए दो अकादमिक सत्र आयोजित किए गए। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. संजय जैन और द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. राम पाल गंगवार ने की।अंत में कार्यक्रम संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में शिक्षक, गैर-शिक्षण अधिकारी और कर्मचारी, शोधार्थी, प्रतिभागी तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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