रांची 17 मार्च (आरएनएस)। केंद्रीय सरना समिति द्वारा आज सिरमटोली में सरहुल पूजा को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सरहुल पर्व को पूरी तरह पारंपरिक रीति-रिवाज और संस्कृति के अनुरूप ही मनाया जाएगा। समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने कहा कि सरहुल पूजा आदिवासी समाज का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व है, जो प्रकृति पूजा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि सरना स्थल और जाहेर स्थल पर पहान पुजारियों द्वारा पारंपरिक विधि से मुर्गा (चेंगना) की बली देकर पूजा-अर्चना की जाती है।
उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि सरहुल पूजा से पहले नए फल, फूल और सब्जियों का उपयोग न करें। साथ ही घर, आंगन, अखाड़ा, सरना स्थल और गांव देवती स्थल की साफ-सफाई सुनिश्चित करें तथा प्रत्येक घर में सरना झंडा लगाएं।
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि अधिक से अधिक लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हों और झांकी के माध्यम से आदिवासी इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करें। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सरहुल में डीजे का उपयोग न कर मांदर-ढोल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों को प्राथमिकता दी जाए। रुपचंद तिर्की ने कहा कि शोभायात्रा समय पर निकले और इसमें ढोल-नगाड़ों की गूंज हो, न कि डीजे और फिल्मी गीतों की। उन्होंने सरकार से मांग की कि पर्व को देखते हुए शहर की सड़कों की मरम्मत, साफ-सफाई और बिजली व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए।
बैठक में अजय कच्छप, विजय कच्छप , कृष्णा लोहरा, अरविंद कच्छप, प्रकाश , सोमरी मुंडा, कार्तिक उरांव, शिबू रुंडा, विकास मुंडा, बजरंग मुंडा, अनीता हंस, अमित तिर्की, धन्जू, रोमन सरवी सहित कई लोग उपस्थित थे।
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