नई दिल्ली ,22 मार्च । अगर आप भी हवाई सफर करते हैं और फ्लाइट में अपनी मनपसंद विंडो या आगे की सीट बुक करने के लिए अतिरिक्त पैसे चुकाते हैं, तो यह खबर आपके लिए ही है। हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयरलाइंस को हर फ्लाइट की 60 फीसदी सीटें यात्रियों को मुफ्त देने का बड़ा फरमान सुनाया था। लेकिन सरकार के इस फैसले से यात्रियों को राहत मिलने के बजाय एयरलाइंस बुरी तरह भड़क गई हैं। देश की प्रमुख एविएशन कंपनियों ने सरकार के इस आदेश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और साफ चेतावनी दी है कि इस फैसले का सीधा खामियाजा आम यात्रियों को महंगे टिकट के रूप में भुगतना पड़ेगा।
इंडिगो और स्पाइसजेट समेत इन कंपनियों ने खोला मोर्चा
सरकार के इस नए नियम का ऐलान 18 मार्च 2026 को किया गया था, जिसके तहत एयरलाइंस को सीट चुनने के नाम पर वसूले जाने वाले चार्ज पर लगाम लगाने को कहा गया था। इस फैसले के कड़े विरोध में भारतीय एयरलाइंस महासंघ (स्नढ्ढ्र) ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय (रूशष्ट्र) के सचिव समीर सिन्हा को एक तीखी चि_ी लिखी है। इस महासंघ में देश की तीन सबसे बड़ी एविएशन कंपनियां इंडिगो, एअर इंडिया और स्पाइसजेट शामिल हैं। इन कंपनियों का साफ कहना है कि सरकार का यह फैसला पूरी तरह से उल्टा पड़ेगा और इससे बजट में सफर करने वाले यात्रियों की जेब पर सीधा डाका डलेगा।
सीट फ्री हुई तो सीधा बढ़ जाएंगे टिकट के दाम
एयरलाइंस ने सरकार को दिए अपने तर्क में स्पष्ट किया है कि अगर वे यात्रियों से मनपसंद सीट चुनने का चार्ज नहीं लेंगी, तो उस नुकसान की भरपाई कहीं न कहीं से तो करनी ही पड़ेगी। कंपनियों का कहना है कि यह घाटा सीधा टिकट के बेस प्राइस को बढ़ाकर पूरा किया जाएगा। उदाहरण के तौर पर, अगर अभी कोई यात्री चार हजार रुपये का टिकट लेता है और तीन सौ रुपये मनपसंद सीट के लिए देता है, तो भविष्य में वह टिकट ही सीधा 4,500 रुपये का हो जाएगा। ऐसे में सीट भले ही मुफ्त मिल जाए, लेकिन यात्री का कुल खर्च पहले से कहीं ज्यादा बढ़ जाएगा। कंपनियों का दावा है कि इससे खासकर उन लोगों को भारी नुकसान होगा जो अपने परिवार के साथ सस्ते में सफर करना पसंद करते हैं।
सरकार के पास दाम तय करने का अधिकार ही नहीं
अपनी भारी नाराजगी जाहिर करते हुए महासंघ ने सरकार के इस आदेश को कानूनी रूप से भी चुनौती दे डाली है। एयरलाइंस का कहना है कि हवाई यातायात को नियंत्रित करने वाली सरकारी संस्था डीजीसीए (ष्ठत्रष्ट्र) के पास कानूनी तौर पर यह अधिकार ही नहीं है कि वह सीट चार्ज जैसी अतिरिक्त सेवाओं के दाम तय करे या उन पर रोक लगाए। कंपनियों ने पुरानी अदालती कार्यवाहियों और फैसलों का हवाला देते हुए सरकार को याद दिलाया है कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर है। एयरलाइंस ने यह भी चिंता जताई है कि अगर सभी कंपनियों को एक ही नियम में बांध दिया गया, तो यात्रियों को मिलने वाली अलग-अलग और बेहतर सुविधाओं (जैसे ज्यादा लेगरूम या बेहतर खाना) की पहचान ही खत्म हो जाएगी।
बिना पूछे थोपा गया फैसला, तुरंत वापस लेने की मांग
इन सभी तर्कों के अलावा एयरलाइंस की सबसे बड़ी शिकायत इस बात को लेकर है कि इतना बड़ा फैसला लेने से पहले उनसे कोई राय-मशविरा नहीं किया गया। महासंघ ने अपनी चि_ी में कड़े शब्दों में लिखा है कि 18 मार्च को मीडिया में प्रेस रिलीज आने से पहले उन्हें इस बारे में कोई भनक तक नहीं थी। न तो सरकार ने कंपनियों के साथ कोई बैठक की और न ही कोई सलाह ली। एयरलाइंस को सीधे अखबारों के जरिए इस नए नियम की जानकारी मिली। कंपनियों ने सरकार से इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की है और चेताया है कि अगर सरकार इसी तरह सेवाओं के दाम में बेवजह दखलंदाजी करती रही, तो भविष्य में उनके लिए अपना कारोबार चलाना नामुमकिन हो जाएगा।
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