सुल्तानपुर 26 मार्च (आरएनएस )। राजकीय मेडिकल कालेज से प्राचार्य द्वारा 43 कर्मचारियों को रिलीव करने के बावजूद अभी भी कुछ रिलिविंग से बचे हुए चिकित्सक अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस से बाज नहीं आ रहे है यही मंजर जनपद को वाराणसी से जोडऩे वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित इकलौता ट्रॉमा सेंटर में भी देखने को मिल रहा है मेडिकल कॉलेज के अधीन होने के बावजूद यहां आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं धडाम नजर आ रही हैं। हालत यह है कि सड़क हादसों में घायल मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा, जिससे उनकी परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है।
जानकारी के अनुसार ट्रॉमा सेंटर में चिकित्सकों की तैनाती होने के बावजूद नियमित सेवाएं नहीं मिल रही हैं। यहां डॉक्टर समीर सुमन, डॉक्टर आर. ए. वर्मा, डॉक्टर गुफरान समेत दो जूनियर रेजिडेंट तैनात हैं, लेकिन केंद्र पर सेवाएं सिर्फ सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक ही सीमित हैं। जबकि नियमों के तहत ट्रॉमा सेंटर में 24 घंटे इमरजेंसी सेवाएं उपलब्ध होनी चाहिए।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि तैनात चिकित्सक सरकारी ड्यूटी से अधिक निजी प्रैक्टिस में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में ट्रॉमा सेंटर की पूरी जिम्मेदारी जूनियर रेजिडेंट्स के कंधों पर आ जाती है। इमरजेंसी की स्थिति में भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता न होने से मरीजों को समुचित इलाज नहीं मिल पाता। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केंद्र में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। यहां एक्स-रे जैसी आवश्यक जांच तक उपलब्ध नहीं है। गंभीर घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद मेडिकल कॉलेज के आकस्मिक कक्ष या लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। कई बार रेफर के दौरान ही मरीज रास्ते में दम तोड़ देते हैं। हाईवे पर लगातार बढ़ते सड़क हादसों के बीच यह ट्रॉमा सेंटर क्षेत्र के लिए जीवन रेखा साबित हो सकता है, लेकिन वर्तमान में यह सिर्फ कागजों तक सीमित होकर रह गया है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि ट्रॉमा सेंटर को तत्काल 24 घंटे संचालित किया जाए, पर्याप्त संख्या में चिकित्सकों की तैनाती की जाए और निजी प्रैक्टिस में लिप्त डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई हो।
जनहित में यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन जल्द ठोस कदम उठाए, अन्यथा आने वाले समय में हादसा पीडि़तों की मौत का आंकड़ा और बढ़ सकता है।
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