वाशिंगटन ,29 मार्च,। दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका इस वक्त दोहरे संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में ईरान के साथ चल रही भीषण जंग में हजारों जानें जा चुकी हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद अमेरिका के भीतर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ जनता का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा है। ट्रंप प्रशासन के खिलाफ विरोध की आग इस कदर भड़क चुकी है कि अमेरिका के सभी 50 राज्यों में हाहाकार मचा हुआ है और जनता सड़कों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन की हुंकार भर रही है। यूरोप से लेकर लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक इस बगावत की गूंज सुनाई दे रही है।
नो किंग्सÓ आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार, 3100 से ज्यादा शहरों में बवाल
अमेरिका की सड़कों पर यह कोई आम प्रदर्शन नहीं है, बल्कि नो किंग्स (कोई राजा नहीं) के बैनर तले आयोजित यह अब तक की सबसे बड़ी बगावत मानी जा रही है। आयोजकों के आंकड़ों पर गौर करें तो इस बार करीब 90 लाख लोगों ने ट्रंप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पूरे देश में 3,100 से ज्यादा विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार विरोध की आग केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि दो-तिहाई रैलियां छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में निकाली गई हैं, जो सत्ता के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है।
मिनेसोटा बना विरोध का केंद्र, हॉलीवुड सितारों ने भी खोला मोर्चा
इस विशाल राष्ट्रव्यापी आंदोलन का मुख्य केंद्र मिनेसोटा की राजधानी सेंट पॉल को बनाया गया था। यहां हॉलीवुड के कई दिग्गज सितारों ने ट्रंप सरकार की ईंट से ईंट बजाने का ऐलान किया। मशहूर रॉक गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने अमेरिकी इमिग्रेशन एजेंटों (ढ्ढष्टश्व) की गोलीबारी में मारे गए रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की याद में अपना नया गाना स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस गाकर लोगों में जोश भर दिया। इस ऐतिहासिक विरोध में अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो, गायिका जोन बेज, अभिनेत्री जेन फोंडा और सीनेटर बर्नी सैंडर्स जैसे बड़े चेहरों ने शिरकत की। कैपिटल की सीढिय़ों पर लगा वह विशाल बैनर पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा था जिस पर लिखा था, हमारे पास सीटियां थीं, उनके पास बंदूकें। क्रांति मिनियापोलिस से शुरू होती है।
इन बड़े मुद्दों पर सुलग रहा है अमेरिका, गूंजा ‘ताज उतारो जोकरÓ का नारा
जनता के इस भारी आक्रोश के पीछे कई अहम वजहें हैं। सबसे बड़ा मुद्दा ट्रंप प्रशासन का वह खौफनाक इमिग्रेशन अभियान है, जिसने मिनेसोटा सहित कई राज्यों में इमिग्रेशन एजेंटों की कार्रवाई से लोगों के दिलों में दहशत भर दी है। इसके अलावा ईरान के साथ थोपे गए युद्ध, ट्रांसजेंडर अधिकारों में की गई कटौती और अमीरों के बढ़ते दबदबे ने आग में घी का काम किया है। वाशिंगटन में लिंकन मेमोरियल के पास मार्च कर रहे लोगों के हाथों में ताज उतारो, जोकर और बदलाव यहीं से शुरू होता है जैसे तीखे नारों वाले बैनर नजर आए। न्यूयॉर्क से लेकर सैन डिएगो तक, हर जगह बस ट्रंप का विरोध दिखाई दे रहा है।
दुनियाभर में गूंजी आवाज, व्हाइट हाउस ने बताया वामपंथियों की साजिश
ट्रंप के खिलाफ यह गुस्सा सिर्फ अमेरिका की सीमाओं तक कैद नहीं रहा। रोम, लंदन और पेरिस जैसे वैश्विक शहरों में भी भारी भीड़ ने अमेरिका-इजरायल के हमलों और नस्लवाद के खिलाफ मार्च निकाला। जिन देशों में राजशाही है, वहां इस आंदोलन को नो टायरेंट्स (कोई तानाशाह नहीं) का नाम दिया गया है। वहीं, इतनी बड़ी बगावत पर व्हाइट हाउस बौखलाया हुआ नजर आ रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप की प्रवक्ता अबीगेल जैक्सन ने इन विशाल रैलियों को महज वामपंथी फंडिंग का खेल करार दिया है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी ने इन्हें हेट अमेरिका रैलीज का नाम दिया है। हालांकि, इडाहो जैसे उन राज्यों में भी भारी भीड़ का उमडऩा, जहां 2024 के चुनाव में ट्रंप को 66 फीसदी वोट मिले थे, यह साफ चीख-चीख कर बता रहा है कि जमीनी हकीकत व्हाइट हाउस के दावों से कोसों दूर है।
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