रांची 29 मार्च (आरएनएस)। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्डी एंड रिसर्च इन लॉ, रांची में दो दिवसीय सेमिनार का आज समापन हो गया। 28–29 मार्च 2026 को जेरियाट्रिक ज्यूरिसप्रूडेंस: गरिमामय वृद्धावस्था के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण विषय पर दो दिवसीय राज्य स्तरीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया। इस सेमिनार में विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं तथा प्रैक्टिशनरों ने भाग लेकर वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों एवं कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श किया।
सेमिनार का उद्घाटन सत्र संयोजक डॉ. अरविंद साहू के स्वागत भाषण के साथ प्रारंभ कार्यक्रम की शुरूआत हुई। जबकि सह-संयोजक डॉ. सौम्यजीत मुखोपाध्याय ने कार्यक्रम के सफल संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।कार्यक्रम के पहले दिन की शुरुआत पंजीकरण के साथ हुई, जिसके बाद प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सौरभ सरकार की फिल्म निभृतोचारी का प्रदर्शन किया गया, जिसमें सकारात्मक वृद्धावस्था की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया।
विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. (डॉ.) अशोक आर पाटिल ने अपने संबोधन में वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सशक्त कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य अतिथि माननीय न्यायमूर्ति श्री न शिवशंकर अमरन्नवर (कर्नाटक उच्च न्यायालय) ने जेरियाट्रिक देखभाल के बदलते कानूनी आयामों तथा न्यायिक संवेदनशीलता के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता तान्या सेनगुप्ता ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों पर विस्तार से चर्चा करते हुए भारत सरकार की पहलों, जैसे राष्ट्रीय वृद्धजन नीति एवं माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण व कल्याण अधिनियम, 2007 पर प्रकाश डाला।
सेमिनार के विभिन्न सत्रों में स्वास्थ्य संबंधी अधिकार, होम केयर सेवाएं और पालीएटिव केयर जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर डॉ. अभिजीत दाम द्वारा विचार प्रस्तुत किए गए। तकनीकी सत्रों में उत्तराधिकार, वसीयत संबंधी अधिकार तथा संपत्ति विवाद जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने गहन चर्चा की। दूसरे दिन के सत्रों में आयुवाद (एजिज्म) से निपटने, सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने तथा वृद्धाश्रम एवं सहायक आवास जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं पर विचार-विमर्श किया गया। इस दौरान डॉ मसूर जहां एवं आशीष सिलस्वाल ने वृद्धावस्था में मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर अपने विचार साझा किए।इसके अतिरिक्त डॉ शशिनाथ मंडल ने विधायी उपायों तथा वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण में राज्य एवं गैर-राज्य संस्थाओं की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
समापन सत्र में सह-संयोजक डॉ. सौम्यजीत मुखोपाध्याय द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया तथा प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस प्रकार यह सेमिनार एक ज्ञानवर्धक एवं सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं पेशेवरों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली, जिससे समकालीन विधिक विमर्श में जेरियाट्रिक ज्यूरिसप्रूडेंस के बढ़ते महत्व की पुष्टि हुई।
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