लखनऊ 30 मार्च (आरएनएस )। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की आपत्ति के बाद उत्तर प्रदेश में अब 31 प्रकार के मामलों में थानों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। इन मामलों में पहले परिवाद यानी शिकायत दर्ज की जाएगी और न्यायालय के आदेश के बाद ही संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज की जा सकेगी। इस संबंध में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्ण द्वारा राज्यभर के पुलिस अधिकारियों को विस्तृत निर्देश जारी किए गए हैं।
यह निर्देश हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा 25 फरवरी को अनिरुद्ध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य मामले में दिए गए आदेश के अनुपालन में जारी किया गया है। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 के तहत सीधे एफआईआर दर्ज किए जाने पर आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया था कि कानून के प्रावधानों के अनुरूप प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।जारी आदेश के अनुसार अब दहेज और घरेलू हिंसा सहित 31 प्रकार के ऐसे मामलों में, जिनमें कानून के तहत केवल परिवाद का प्रावधान है, पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। ऐसे मामलों में थानों पर केवल शिकायत दर्ज की जाएगी, जिसे आगे की कार्रवाई के लिए न्यायालय को भेजा जाएगा। न्यायालय के निर्देश प्राप्त होने के बाद ही संबंधित मामलों में विधिक रूप से एफआईआर दर्ज की जाएगी।डीजीपी द्वारा जारी निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि जिन मामलों में कानून के अनुसार केवल परिवाद का प्रावधान निर्धारित है, उनमें एफआईआर दर्ज करना विधिसम्मत नहीं है। ऐसे मामलों में न्यायालय की अनुमति के बिना एफआईआर दर्ज करना गलत माना जाएगा। उन्होंने सभी पुलिस अधिकारियों को न्यायालय के निर्देशों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने तथा प्रक्रिया में किसी प्रकार की लापरवाही न बरतने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 219 का उल्लेख करते हुए कहा था कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से 84 के अंतर्गत दंडनीय अपराधों में कोई भी न्यायालय तब तक संज्ञान नहीं ले सकता, जब तक कि पीडि़त व्यक्ति की ओर से विधिवत शिकायत प्रस्तुत न की गई हो। अदालत ने यह भी कहा कि इन प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि विधिक प्रक्रिया सही ढंग से संचालित हो सके।
इस नए निर्देश के लागू होने के बाद प्रदेश में दहेज, घरेलू हिंसा और अन्य परिवाद आधारित मामलों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है। अब इन मामलों में पुलिस की भूमिका शिकायत दर्ज करने और उसे न्यायालय तक पहुंचाने तक सीमित रहेगी, जबकि आगे की विधिक कार्रवाई न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से विधिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और नियमबद्ध बनेगी तथा न्यायालय की भूमिका इन मामलों में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
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