इलाहाबाद 08 April, (Rns): कानपुर में फर्जी पीएचडी डिग्री और यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर की नौकरी दिलाने के नाम पर हुई लाखों रुपये की ठगी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने मुख्य आरोपी महिला की एफआईआर रद्द करने की याचिका को खारिज करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि समाज में एक बहुत ही डरावना चलन पनप रहा है, जहां आम आदमी यह सोचने लगा है कि रिश्वत देकर कुछ भी हासिल किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कमजोर नैतिकता को दर्शाने वाले ऐसे अपराधों को बिना सजा के बिल्कुल नहीं छोड़ा जा सकता।
इस तरह बुना गया ठगी का शातिर जाल
इस पूरे फर्जीवाड़े की एफआईआर कानपुर के स्वरूप नगर थाने में 14 सितंबर 2024 को दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता तान्या दीक्षित ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि विक्रम सिंह सेंगर नाम का शख्स उनके घर आता-जाता था। वह अक्सर अपनी मां तृप्ति सिंह सेंगर और दोस्त प्रियंका सिंह सेंगर (याचिकाकर्ता) के साथ आता था। ये सभी मिलकर सरकार, प्रशासन और कानपुर यूनिवर्सिटी में अपनी ऊंची पहुंच की बड़ी-बड़ी डींगें हांकते थे। जब तान्या ने नौकरी की इच्छा जताई, तो इन लोगों ने उसे झांसे में लेते हुए कहा कि उसे बिना मेहनत किए ही पीएचडी की डिग्री मिल जाएगी और यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर की नौकरी भी पक्की करवा दी जाएगी।
22 लाख ऐंठे, फिर थमा दी फर्जी डिग्री और जॉइनिंग लेटर
इन शातिरों के झूठे आश्वासनों और उनकी ऊंची पहुंच के दावों पर भरोसा करते हुए तान्या ने उनके बैंक खातों में कुल 22 लाख 18 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए। इसके बाद आरोपियों ने उसे ठगते हुए पीएचडी की फर्जी डिग्री और कानपुर स्थित एक यूनिवर्सिटी का फर्जी नियुक्ति पत्र थमा दिया। जब शिकायतकर्ता अपनी जॉइनिंग के लिए खुशी-खुशी यूनिवर्सिटी पहुंची, तो वहां के रजिस्ट्रार ने दस्तावेजों को देखते ही बता दिया कि वे पूरी तरह से जाली हैं। ठगी का अहसास होने पर जब पीड़िता ने अपने पैसे वापस मांगे और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी, तो आरोपियों ने उसे जान से मारने और गंभीर मुकदमों में फंसाने की धमकियां देनी शुरू कर दीं।
‘यह समाज का डरावना चलन’, पुलिस को ईमानदार जांच के आदेश
इस मामले में आरोपी प्रियंका सेंगर ने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की गुहार लगाई थी। उनके वकील ने दलील दी कि अन्य दो आरोपियों को कोर्ट से अंतरिम राहत मिल चुकी है। लेकिन जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका ठुकरा दी। अदालत ने हैरानी जताते हुए कहा कि एक पढ़ी-लिखी महिला भी इस भ्रष्ट तंत्र के झांसे में आ गई। बिना तय प्रक्रिया और मेहनत के न तो पीएचडी मिल सकती है और न ही प्रोफेसर की नौकरी। कोर्ट ने मामले को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दखल देने योग्य नहीं माना और कानपुर पुलिस कमिश्नर समेत संबंधित अधिकारियों को इस पूरे प्रकरण की पूरी ईमानदारी और सख्ती से जांच करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

