प्रयागराज 9 अप्रैल (आरएनएस)। होम्योपैथी से रोगों को जड़ से मिटाया जा सकता है। क्रॉनिक डिजीज के सफल उपचार के लिए मरीज के वर्तमान हिस्ट्री लक्षणों के विवरण के साथ मरीज के इलाज के पहले दिन से लेकर इलाज पूर्ण होने तक की सभी रिपोर्ट, उपचार का रिकॉर्ड के साथ ही इलाज से पूर्व करायी गयी जांच रिपोर्ट से लेकर रोगमुक्?त होने तक की जांच रिपोर्ट अनिवार्य रूप से शामिल करें, क्?योंकि यही रिपोट्र्स वे सबूत होते हैं जो आप द्वारा किये गये इलाज की सफलता की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि करते हैं। यह महत्?वपूर्ण बातें शर्मा होम्योपैथिक चिकित्सालय एंड रिसर्च सेंटर इटवा के चीफ कन्?सल्?टेंट डॉ भास्कर शर्मा ने विश्व होम्योपैथिक दिवस पर कहीं।
उन्होंने कहा कि होम्?योपैथी के दम को साइंटिफि?क कसौटी पर खरा साबित करने के लिए रोगी के दस्?तावेजों को सबूत के तौर पर रखना होगा। डा. भास्कर शर्मा ने यह भी कहा कि सिर्फ रोगी के कथन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सबूत नहीं माना जा सकता है। ज्ञात हो डॉ भास्कर शर्मा के रिसर्च वर्क का सफर उनकी होम्?योपैथी शिक्षा के दौरान ही प्रारम्?भ हो गया था। अब तक विभिन्?न प्रकार के रोगो में एक्?सपेरिमेंटल रिसर्च कर डॉ भास्कर शर्मा देश ही नहीं विदेशों में भी अपने कार्य का लोहा मनवा चुके हैं। उन्?होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि कई रोगी उनके पास किडनी में पथरी की शिकायत लेकर आये, मैंने उनका अल्?ट्रासाउंड कराया तो पथरी होने की पुष्टि हुई। उसका उपचार शुरू किया गया। कुछ दिन बाद आकर रोगी ने कहा कि उसकी पथरी निकल गयी। उसने एक पत्?थर दिखाते हुए कहा कि यह पेशाब में निकला है। मैंने उससे कहा कि एक अल्?ट्रासाउंड करा लीजिये तो मरीज का कहना था कि मुझे अब आराम है, मैं कह रहा हूं तो इसकी क्?या आवश्?यकता है, इस पर मैंने उस रोगी को अल्?ट्रासाउंड जांच का शुल्?क देते हुए उससे जांच कराने को कहा, उसने जांच करायी तो अल्?ट्रासाउंड रिपोर्ट में देखा कि पथरी नहीं थी। यह एक वैज्ञानिक सबूत हुआ कि उपचार से पूर्व अल्?ट्रासाउंड रिपोर्ट में जो पथरी दिख रही थी, वह अब नहीं है।
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