नई दिल्ली,16 अपै्रल। वैश्विक व्यापार के समीकरणों में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में चीन एक बार फिर अमेरिका को पछाड़कर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है. पिछले चार वर्षों (2021-22 से 2024-25) तक अमेरिका इस पायदान पर काबिज था, लेकिन इस साल द्विपक्षीय व्यापार में हुई भारी वृद्धि ने चीन को शीर्ष पर पहुंचा दिया है.
वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत और चीन के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2025-26 में 151.1 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है. हालांकि, इस व्यापारिक बढ़त का एक चिंताजनक पहलू भारत का बढ़ता व्यापार घाटा है. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में 99.2 अरब डॉलर था.
पिछले वित्त वर्ष के दौरान चीन को भारत का निर्यात 36.66 प्रतिशत बढ़कर 19.47 अरब डॉलर रहा. वहीं, चीन से होने वाला आयात 16 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 131.63 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
दूसरी ओर, अमेरिका के साथ भारत का व्यापार थोड़ा धीमा रहा. अमेरिका को होने वाला निर्यात मात्र 0.92 प्रतिशत बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.95 प्रतिशत बढ़कर 52.9 अरब डॉलर हो गया. इसके परिणामस्वरूप अमेरिका के साथ भारत का व्यापार सरप्लस घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया.
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत ने यूएई, जर्मनी, इटली और वियतनाम जैसे देशों के साथ निर्यात में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की है. हालांकि, नीदरलैंड, ब्रिटेन, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख देशों को होने वाले निर्यात में गिरावट देखी गई है. वहीं, रूस और ऑस्ट्रेलिया से होने वाले आयात में भी कमी आई है.
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन से आयात में वृद्धि मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और इंटरमीडिएट गुड्स की वजह से है, जो भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए आवश्यक हैं. हालांकि, $112 बिलियन का विशाल व्यापार घाटा नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह घरेलू बाजार में चीनी वस्तुओं पर निर्भरता को दर्शाता है.
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