जौनपुर 17 अप्रैल (आरएनएस)। भगवान परशुराम की कर्म व तपोभूमि उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले की सदर तहसील क्षेत्र के आदि गंगा गोमती के पावन तट स्थित जमैथा गांव ही रहा , जहां पर महर्षि यमदग्नि ऋषि का आश्रम आज भी है और उन्हीं के नाम पर जिला यमदग्निपुरम् रहा, बाद में धीरे धीरे जौनपुर हो गया। परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था, इस बार अक्षय तृतीया 19 अप्रैल रविवार को पड़ रही है, इसलिये पूरे देश में इसी दिन उनकी जयन्ती मनायी जायेगी। भगवान परशुराम के यदि वंशज को देखा जाय तो महाराज गाधि के एक मात्र पुत्री सत्यवती व पुत्र ऋषि विश्वामित्र थे। स्त्यवती का विवाह ऋचीक ऋषि से हुआ। उनके एक मात्र पुत्र यमदग्नि ऋषि थे। ऋषि यमदग्नि का विवाह रेणुका से हुआ और इनसे परशुराम पैदा हुए। परशुराम का पृथ्वी पर अवतार अक्षय तृतीय के दिन हुआ था। ये भगवान विष्णु के छठे अवतार भी माने जाते थे। परशुराम के गुरू भगवान शिव थे। उन्ही से इन्हे फरसा मिला था। महर्षि यमदग्नि ऋषि जमैथा ( जौनपुर ) स्थित अपने आश्रम पर तपस्या कर रहे थे , तो आसुरी प्रवृत्ति के राजा कीर्तिवीर ( जो आज केरार वीर हैं )उन्हें परेशान करता था । यमदग्नि ऋषि तमसा नदी ( आजमगढ़ ) गये , जहां भृगु ऋषि रहते थे। उनसे सारी बात बताये , तो भृगु ऋषि ने उनसे कहा कि आप अयोध्या जाइयें। वहां पर राजा दशरथ के दो पुत्र राम व लक्ष्मण है। वे आपकी पूरी सहयता करेगें। यमदग्नि ऋषि अयोध्या गये और राम लक्ष्मण को अपने साथ लाये। राम व लक्ष्मण ने कीर्तिवीर को मारा और गोमती नदी में स्नान किया तभी से इस घाट का नाम राम घाट हो गया। यमदग्नि ऋषि बहुत क्रोधी थे। परसुराम पिता भक्त थे। एक दिन उनके पिता ने आदेश दिया कि अपनी मां रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दो। परशुराम ने तत्काल अपने फरसे से मां का सिर काट दिया, तो यमदग्नि ऋषि बोले, क्या वरदान चाहते हो , टू परशुराम ने कहा कि यदि आप वरदान देना चाहते हैं , तो मेरी मां को जिन्दा कर दीजिये। यमदग्नि ऋषि ने तपस्या के बल पर रेणुका को पुन: जिन्दा कर दिया। जीवित होने के बाद माता रेणुका ने कहा कि परशुराम तूने अपने मां के दूध का कर्ज उतार दिया। इस प्रकार पूरे विश्व में परसुराम ही एक ऐसे हैं जो मातृ व पित्रृ ऋण से मुक्त (उऋण) हो गये हैं । परशुराम ने तत्कालीन आसुरी प्रवृत्ति वाले क्षत्रियों का ही विनाश किया था, यदि वे सभी क्षत्रियों का विनाश चाहते तो भगवान राम को अपना धनुष न देते, यदि वे धनुष न देते तो रावण का वध न होता। परशुराम में शस्त्र व शास्त्र का अद्भुत समन्वय मिलता है । कुल मिलाकर देखा जाय तो जौनपुर के जमैथा में उनकी माता रेणुका बाद में अखण्डो अब अखड़ो देवी का मन्दिर आज भी मौजूद है जहां लोग पूजा अर्चना करते है। जमैथा गांव स्थित भगवान परशुराम की तपस्थली जहां पर इस समय उनकी माता रेणुका का मंदिर बना हुआ है, इस समय यहआस्था का केंद्र बना बन गया है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कराने का प्रयास सरकार को करना चाहिए महर्षि जमदग्नि ऋषि का आश्रम यही है और भगवान परशुराम यहीं पर तपस्या किए थे। जौनपुर में बहुप्रतीक्षित आराध्य भगवान परशुरामजी की भव्य प्रतिमा की स्थापना कर दी गई है। यह प्रतिमा पूर्व में तय स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग 731 के बाईपास ग्राम कुल्हनामऊ तहसील सदर में लगी है। जयपुर से ट्रक द्वारा लाई गई इस प्रतिमा को श्री हनुमान जन्मोत्सव के दिन कुशल इंजीनियरों और वास्तुकारों ने अपने निर्देशन में स्थापित कर दिया है। इस मूर्ति स्थापना में पंडित मुरलीधर चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी उद्योगपति प्रमोद पाठक है। उन्होंने आराध्य भगवान श्री परशुराम के मूर्ति के पद पर तिलक लगाकर पुष्पहार अर्पण कर विधिवत पूजन करने बाद जयघोष के साथ मूर्ति को स्थापित कर दिया। मूर्ति का 19 अप्रैल अक्षय तृतीया को परशुराम जन्मोत्सव पर 51 बटुक ब्राह्मणों द्वारा वैदिक विधि विधान से पूजन अर्चन के बाद मूर्ति को आम जनता के दर्शन हेतु भव्य लोकार्पण समारोह बाद में खोल दिया जाएगा।
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