सिस्टम की आंखों में धूल या संरक्षण का खेल
सुल्तानपुर 17 अप्रैल (आरएनएस)। शहर में स्वास्थ्य व्यवस्था का एक अनोखा नमूना इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। दो शटरों के बीच संचालित हो रहा एक तथाकथित अस्पताल न सिर्फ मरीजों का इलाज कर रहा है बल्कि नियम-कानूनों को भी आईसीयू में भर्ती कर चुका है।
बताया जा रहा है कि इस अस्पताल में डॉ. मो. नदीम खान और डॉ. अबसार अहमद का नाम तो बड़े गर्व से लिया जाता है जबकि दोनों ही चिकित्सकों ने यहां अपनी सेवाएं देने से साफ इनकार कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि जब डॉक्टर ही नहीं हैं तो इलाज कौन कर रहा है या फिर इलाज के नाम पर कुछ और ही चल रहा है। उधर डॉ. बुशरा अंजुम को स्त्री रोग विशेषज्ञ बताया जाता है लेकिन उनकी डिग्री किस अलमारी में बंद है या किस फाइल में दब गई है इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नजर नहीं आता। शायद यह भी गोपनीय श्रेणी में आता हो। इस पूरे खेल के केंद्र में हैं डॉक्टर हैदर जो खुद को डॉक्टर लिखने वाले हैदर साहब। जिनका अतीत जिला अस्पताल में आउटसोर्सिंग के जरिए पुरुष स्टाफ नर्स के रूप में कुछ समय बिताने का रहा है। आरोपों की फेहरिस्त इतनी लंबी बताई जाती है कि अंतत: उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लेकिन जनाब का हौसला देखिए अब खुद ही अस्पताल चला रहे हैं। सबसे दिलचस्प पहलू है उनकी डिग्री बीईएमएस जिसे एसीएमओ/नोडल अधिकारी डॉ. जे.सी. सरोज द्वारा फर्जी बताया जा चुका है। इसके बावजूद हैदर साहब का डॉक्टरी आत्मविश्वास जरा भी कम नहीं हुआ।
अब असली सवाल यही है कि आखिर यह सब कैसे चल रहा है? क्या यह सिर्फ प्रशासन की नाक के नीचे हो रहा खेल है या फिर ऊपर तक इसकी जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंदी जा रही हैं। चर्चा है कि बिना किसी संरक्षण के इस तरह का संचालन संभव ही नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी ही इस अस्पताल की सबसे बड़ी दवा बन गई है। फिलहाल सब सोचने पर मजबूर है कि इलाज कराने जाएं या सिस्टम के इस चमत्कार को देखने। क्योंकि यहां बीमारी से ज्यादा गंभीर स्थिति नियमों और जिम्मेदारियों की नजर आ रही है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को भी रूटीन जांच में डालकर ठंडे बस्ते में भेजते हैं या फिर कभी इन दो शटरों के बीच छिपे सच पर भी ताला टूटेगा।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

