-ब्रम्हा जी ने किया था षंकर भगवान की प्रतिमा की स्थापना: प्रदीप महाराज
चित्रकूट। भारत वर्ष के सांस्कृतिक गौरव का केन्द्र बिन्दु चित्रकूट में मंदाकिनी तट मत्स्यगयेन्द्रनाथ भगवान भोले का मंदिर है जो सभी कामनाओं के पूरक माने जाते हैं। यहां जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मन्नतें मांगता है भगवान भोले उनकी मनोकामनायें अवश्य पूरी करते हैं। मंदिर के व्यवस्थापक पं0 प्रदीप तिवारी बताते हैं कि मर्यादा पुरूषोंत्तम भगवान श्रीराम की वनवास स्थली चित्रकूट अत्यन्त प्राचीन ऐतिहासिक, प्राकृतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल है। यहां रामघाट में स्थित मत्स्यगयेन्द्रनाथ का प्राचीन मंदिर मनोकामनाओं के पूरक हैं। इस मंदिर मं स्थापित श्रीश्शंकर भगवान की प्रतिमा सृष्टि रचना के पूर्व ब्रम्हा जी ने किया था। बताते हैं ब्रम्हा जी ने 30 धनुष के आयात में जगह लेकर 108 कुण्ड बनाकर यज्ञ किया था जिसके फलस्वरूप उन्हें शिवमूर्ति प्राप्त हुई वहीं प्रतिमा इस मंदिर में स्थापित है। त्रेता में जब भगवान राम वनवास हेतु चित्रकूट आये तो इन्हीं से आज्ञा लेकर भगवान राम ने यहां साढे ग्यारह वर्ष पूरे किये। सन् 1683 में कालिंजर विजय हेतु मुगल सम्राट औरंगजेब इस क्षेत्र में आया तो चित्रकूट को बुन्देलखण्ड का प्रसिद्ध तीर्थ मानकार मंदिर तोडने हेतु चित्रकूट आया। यहां आकर उसने श्री मत्यगयेन्द्र नाथ जी की मूर्ति को तोडऩे के उद्देश्य से टांकी चलायी तो ठीक उसी समय औरंगजेब सहित सेना में हैजे की बीमारी फैल गई। कुछ इतिहासकारों एव विद्वानों का इस विषय में अपने अलग-अलग विचार हैं। जिनमें कुछ का मानना है कि मूर्ति उछल कर मन्दाकिनी नदी में चली गई और कुछ का मानना है कि यह वहीं प्राचीन प्रतिमा हैं जब औरंगजेब के शाही हकीमों ने इलाज से इन्कार कर दिया तब उसने यहां के निवासी कोल भीलों से पूंछा कि आप लोग बीमारी आदि में किस हकीम से इलाज करवाते हो तो उन्होंने वर्तमान बालाजी मंदिर के पास रहने वाले एक साधु के बारे में बताया। तब औरंगजेब उस साधु के पास गया और अपनी बीमारी का इलाज पूंछा तो उन्होंने अपनी धूनी की राख औरंगजेब को दिया जिससे वह स्वस्थ्य हो गया तब औरंगजेब ने उस साधु से कहा कि मैं आप की क्या सेवा करूं, तो साधु ने उसे तत्काल चित्रकूट छोडऩे को कहा और औरंगजेब ने अपने द्वारा निर्मित हो रही मस्जिद को उस साधु को मन्दिर हेतु दान कर दिया । उस मंदिर के खर्चै के लिये 8 गांव की जागीर भी लगा दिया। इस प्रकार यह मंदिर अपने आप में एक अद्भुत और ज्वलंत उदाहरण है। यहां प्रति सोमवार, प्रदोष, प्रमुख त्योहारों शिवरात्रि आदि पर्वों एवं अमावस्या पर विशेष भीड एकत्र होती है जो श्री मत्यगयेन्द्र नाथ जी का पूजन, दर्शन करके अपनी-अपनी कामनाओं को पूरा करती हैं। जो भी भक्त दर्शनार्थी यहां किसी भी प्रकार की कामना करता है और श्रद्धा विश्वास के साथ पूजन एवं अर्चना करता है तो उसकी कामना अवश्य पूरी होती है इस में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है।
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