अजय दीक्षित
हर साल पहली मई को विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मई ( श्रमिक) दिवस मनाया जाता है। अकेले भारत में 62 करोड़ सर्वाधिक श्रमिक हैं। विश्व की अर्थव्यवस्था में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन समाज में सबसे कम रोजगारी इसी तबके को मिलती है। दक्षिण एशिया, अफ्रीका देशों में हालत सबसे खराब है। लेकिन यूरोपीय देशों फ्रांस, जर्मनी,स्पेन, ब्रिटिश इटली, हंगरी,पोलैंड,चेकोस्लोवाकिया, यूक्रेन, रूस, डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, ग्रीस, ऑस्ट्रिया, ऑस्ट्रेलिया,में मजदूर की हालत बहुत अच्छी है।चाइना में भी तकरीबन 50 करोड़ मजदूर है। जबकि अंगोला, नाइजीरिया, इथोपिया,में हालत खराब है।
बैसे तो देखा जाय तो समाज का यही तबका ऐसा है क्योंकि मजदूरों के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता है चाहे वह शिक्षा से जुड़ा हो या चिकित्सा से । कारखाने, कृषि,जो भी उत्पादन के क्षेत्र में मजदूर ही प्रमुख है। मजदूरों के कुछ संगठित क्षेत्र है लेकिन असंगठित क्षेत्र में बहुत से मजदूर होते हैं जैसे निर्माण,टैक्सी चालक, रिक्शा चालक,रेडी वाला टांगें वाला, माइक वाला, खोमचे वाला इत्यादि।
1919 में रूसियों की क्रांति मजदूरों की ही क्रांति थी लेनिन, स्टालिन, शुरू आती नेता थे।
दरअसल मजदूरी प्रथा कोई नई नहीं है।जबसे समाज और निर्माण बना तभ भी मजदूर थे ।भारत में राजा रजवाड़े के समय बेगारी की प्रथा थी लेकिन तब श्रमिक संगठित नहीं था।
कार्ल मार्क्स ने पूरी दुनिया को समाजवाद से साम्य बाद परिकल्पना की। उन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया के मजदूर इकठ्ठे हो जाय और सत्ता पर कब्जा कर लिया जाए। रूसी क्रांति, यूरोप का रिवोल्यूशन,चाइना में माओ बाद उत्पन्न हुआ।
कार्लमाक्स का सिद्धांत है कि पूरी दुनिया के लोगों समानता रहनी चाहिए क्योंकि सब ने मनुष्यों में जन्म लिया है।इसी अवधारणा के चलते साम्य बाद का जन्म हुआ। कार्लमाक्स पूंजी बाद,राजशाही, कुलीनतंत्र, राजतंत्र के खिलाफ थे ।रूसी क्रांति के दौर में वहां के जार (राजा) की हत्या कर दी गई थी। इसी प्रकार चाइना में माओ के नेतृत्व में लॉन्ग मार्च कर 1949 में सत्ता का तख्ता पलट कर दिया गया था।
पोलैंड,चेकोस्लोवाकिया, हॉलैंड, सहित कई देशों में साम्यवाद स्थापित हुआ । सोवियत संघ इन देशों का अंतराष्ट्रीय स्तर पर अगुआ था। मजदूरों के पक्ष में कड़े नियम बढ़ाए गए। ट्रेड यूनियन की स्थापना हुई और कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई कई स्थानों पर बात पार्टी भी नाम था।
लेकिन समय के साथ इन ट्रेड यूनियनों,ने सत्ता स्थापित कर वही कार्य किया। इनमें भी अवगुण पैदा होते गए।दूसरे जिम्मेदारी के अभाव के चलते पूंजीवाद के समक्ष इनके उत्पाद बाजार में ठहर नहीं सके ।1991 में सोवियत संघ का पतन हुआ और पूरे विश्व में पूंजीवाद का बोलबाला होता गया। चाइना ने उदारवादी व्यवस्था लागू कर दी।
पूंजीवाद में मजदूरों के हित सीमित कर दिए गए और ट्रेड यूनियनों को भंग कर दिया गया या सीमित कर दिया गया।
अब रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटिश, इटली, हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, यूक्रेन,में भी कैपिटलिज्म है।
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