लेफ्टिनेंट जनरल सय्यद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)
ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल स्मरणोत्सव के लिए एक तारीख नहीं है; यह भारत की रणनीतिक सोच में एक सुदृढ़ और निर्णायक बदलाव पर विचार करने का क्षण है। 7 मई 2026 की घटनाएं, एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं— इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छा, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता, और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को रेखांकित किया। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर को जटिल, बहु-क्षेत्रीय परिवेश में भारत के भविष्य के संघर्ष संचालन के एक निर्णायक प्रारूप के रूप में याद किया जाएगा।
इस सफलता के मूल में अटूट राजनीतिक स्पष्टता थी। दशकों तक, सीमा-पार की उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम में ही सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम का त्याग करने का नहीं, बल्कि इसके परिष्कार को रेखांकित किया— इसने भारत की संवेदनशील तरीके से बल-प्रयोग करने की क्षमता को प्रदर्शित किया, सटीक रणनीतिक संदेश दिया और आवश्यकता पडऩे पर निर्णायक रूप से स्थिति के विस्तार की क्षमता को बनाए रखा। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल निर्णायक कार्रवाई करने का इरादा दिखाया, बल्कि सैन्य कमांडरों को संचालन में लचीलेपन से सशक्त करने का आत्मविश्वास भी प्रदर्शित किया। उद्देश्य की यह स्पष्टता गति, सटीकता और सामंजस्य में बदल गई—ये तीन विशेषताएं सफल आधुनिक सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं। राजनीतिक इच्छा शक्ति, जब संस्थागत क्षमता के साथ संयोजित होती है, तो यह एक बल गुणक बन जाती है। ऑपरेशन सिंदूर इस तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण था।
भारत की बहु-क्षेत्रीय क्षमताओं का निर्बाध एकीकरण भी समान रूप से महत्वपूर्ण था। आधुनिक युद्ध अब केवल भूमि, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं है; यह साइबर, अंतरिक्ष और विद्युतचुंबकीय आयाम तक भी फैल गया है। ऑपरेशन सिन्दूर ने इन क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करने में भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। सटीक हमलों में साइबर संचालन ने पूरक भूमिका निभाई, जिसने विरोधियों की संचार और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को बाधित किया। विशेष रूप से हमले के बाद के नुकसान का आकलन करने में, अंतरिक्ष आधारित उपकरणों ने वास्तविक समय में निगरानी और लक्ष्य-निर्धारण सुनिश्चित किया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं ने शत्रु की जवाबी कार्रवाई को कमजोर कर दिया। इस अभियान ने संयुक्त कार्यक्षमता में परिपक्वता को प्रतिबिंबित किया—समन्वय से आगे बढ़कर सच्चे एकीकरण तक।
नागरिक-सेना एकीकरण की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ऑपरेशन सिंदूर एक अकेला सैन्य अभियान नहीं था; यह एक पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थाओं और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ समन्वय में काम किया। देशी तकनीकों—निगरानी प्रणालियों से लेकर सटीक हथियारों तक—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भरता में सतत निवेश के लाभ को उजागर करती हैं। इस अभियान ने भारत की निर्णय-निर्माण संरचना की दक्षता भी प्रदर्शित की, जहां अंतर-एजेंसी समन्वय नौकरशाही निष्क्रियता से बाधित नहीं हुआ, बल्कि साझा उद्देश्य की भावना से प्रेरित रहा।
अभियान से पहले और अभियान के दौरान भारत की पहलों में रणनीतिक दूरदर्शिता झलकती थी। कूटनीतिक संवाद ने सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाइयों को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए—सटीक, आवश्यक और समानुपाती।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया एक अनुमानित मार्ग का पालन कर रही थी। सैन्य दृष्टि से, वह सुसंगत जवाब देने में संघर्ष करता रहा, जिसे क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व दोनों ने सीमित किया। कूटनीतिक रूप से, उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय रूप देने का प्रयास किया, लेकिन उसे सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था। वास्तविक परिस्थितियों को छुपाने के प्रयास में गलत जानकारी की चालाकी से बौछार की गई। फिर भी, विश्वसनीयता और सुसंगत व्यवस्था आम तौर पर अनुपस्थित रहीं। वास्तविक समय पर जानकारी और वैश्विक निगरानी के युग में, ऐसी कहानियाँ जल्द ही बेनकाब हो जाती हैं।
इस झूठे प्रचार का स्पष्टता और आत्मविश्वास से सामना करना और विरोध करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर भारतीय आक्रामकता नहीं थी, बल्कि यह स्पष्ट उकसावे पर संतुलित प्रतिक्रिया थी। उद्देश्यों में सटीकता थी, लक्ष्य वैध थे, और क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने अनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया; जो संयम के विशेष लक्षण हैं। भारत ने पूरी प्रक्रिया में सूचना की सत्यनिष्ठा बनाए रखी। पारदर्शिता बनाए रखकर और विश्वसनीय संचार चैनलों का उपयोग करके, भारत ने आख्यान को तोडऩे-मरोडऩे के प्रयासों को प्रभावी ढंग से नाकाम कर दिया।
ऑपरेशन सिन्दूर से कई सबक सामने आये हैं, जो भविष्य के लिए मूल्यवान मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सबसे पहले, राजनीतिक इच्छाशक्ति की केंद्रीय भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। रणनीतिक अस्पष्टता अक्सर विरोधियों का हौसला बढ़ाती है; स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास लगातार जारी रहना चाहिए। बढ़त बनाए रखने के लिए साइबर, अंतरिक्ष, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश जारी रखना महत्वपूर्ण होगा। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय शक्ति का समन्वित तरीके से उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
एक अन्य महत्वपूर्ण सबक सूचना युद्ध के क्षेत्र में निहित है। धारणा की लड़ाई सतत और सीमाहीन होती है। भारत को गलत जानकारी का पता लगाने, उसका मुकाबला करने और पूर्व-कार्रवाई करने की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए। त्वरित और विश्वसनीय संचार के लिए इसमें केवल तकनीकी उपकरण ही नहीं, बल्कि संस्थागत तंत्र भी शामिल हैं। आख्यान को जीतना रणनीतिक सफलता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
ऑपरेशन सिंदूर रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी सुदृढ़ करता है। स्वदेशी प्रणालियों ने अपनी योग्यता साबित की, जिससे बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम हुई और संचालन से जुड़ी स्वायत्तता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश के माध्यम से इस गति को बनाए रखा जाना चाहिए। इस प्रयास में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल महत्वपूर्ण होगा।
अंतत:, यह अभियान अस्थिर सुरक्षा वातावरण में हमेशा तैयार रहने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। निवारण एक स्थिर अवधारणा नहीं है; इसे प्रदर्शित क्षमता और संकल्प के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए। ऑपरेशन सिंदूर ने एक मानक स्थापित किया है, लेकिन इस स्थिति को बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण, और सैद्धांतिक विकास के माध्यम से सतत प्रयास की जरूरत है।
जब भारत ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर विचार करता है, तो व्यापक संदेश स्पष्ट हैं। यह रणनीतिक व्यक्तव्य के साथ एक अभियान था। इसने यह दिखाया कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की निर्णायक क्षमता और इच्छा दोनों मौजूद है। इसने यह दर्शाया कि संयम अपनाना एक विकल्प है—अनिवार्यता नहीं।
आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहु-क्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के उदाहरण के रूप में किया जाएगा, जिसमें मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय एकजुटता के तत्व मौजूद हैं। इसने अपेक्षाओं को फिर से परिभाषित किया है—भारत के भीतर और देश के बाहर दोनों में। इससे भी महत्वपूर्ण, इसने एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को सुदृढ़ किया है; जब राष्ट्रीय संकल्प का क्षमता के साथ संयोजन होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर की विरासत केवल इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास में निहित है जो इसने पैदा किया है, उन सबकों में निहित है, जो इसने आत्मसात किए हैं और उस मार्ग में निहित है, जो इसने भारत के सामरिक भविष्य के लिए निर्धारित किया है। अनसुलझे संघर्ष भारत की परीक्षा लेते रहेंगे—विभिन्न क्षेत्रों में और विकसित होते प्ररूपों में। फिर भी, जब तक राष्ट्र के राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत प्रभाग एक साथ कार्य करेंगे, स्पष्टता और उद्देश्य के साथ अपनी क्षमताओं को एकीकृत करेंगे, प्रभाव का संतुलन भारत के पक्ष में रहेगा।
लेखक बिहार के राज्यपाल और भारत के श्रीनगर स्थित चिनार कॉर्प्स के पूर्व कमांडर हैं
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

