नई दिल्ली,12 मई (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौखिक रूप से कहा कि सबरीमला मंदिर में मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं को प्रवेश से रोकना निषेध’ है या नहीं, आखिरकार यह अंतरात्मा की बात है. शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि अगर लोग, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये, मिलकर यह तय करते हैं कि इस प्रथा में सामाजिक सुधार की जरूरत है, तो कोर्ट शायद ऐसे सुधार को मान लेगा.
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और दाऊदी बोहरा समेत कई धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और क्षेत्र से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.
पीठ में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.
इस मामले में कुछ पक्षों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने सबरीमला मंदिर के बारे में कहा कि महिलाओं को मंदिर में जाने से रोकने का पूरा कारण उनके पीरियड्स की उम्र है. हंसारिया ने कहा, मुझे 10 साल की लड़की समझिए. मैं परिवार के साथ (मंदिर) जा रही हूं. पीरियड्स के बारे में, यह एक निषेध हैज्
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, अगर आप इसे निषेध मानते हैं तो यह निषेध है और अगर आप इसे निषेध नहीं मानते (तो यह नहीं है)ज् सवाल यह है कि आप इसे कैसे देखते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि एक भक्त और एक गैर-भक्त इसे कैसे देखते हैं और किसी को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए. हंसारिया ने तर्क दिया कि वह एक भक्त हैं लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि यह निषेध है, और मेरी अंतरात्मा इसे निषेध या कलंक नहीं मानती.
यह तर्क दिया गया कि सामाजिक कल्याण के लिए बनाए गए राज्य कानून को बनाए रखा जाना चाहिए, न कि सिर्फ इसलिए रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि यह धार्मिक रीति-रिवाजों पर असर डालता है.
हंसारिया ने कहा कि यह एक धार्मिक प्रथा है और इसमें सामाजिक सुधार की आवश्यकता है और अनुच्छेद 25 2(बी) के तहत एक कानून बनाया गया है, उस कानून को इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि यह एक जरूरी धार्मिक प्रथा है क्योंकि अनुच्छेद 26 (बी) अनुच्छेद 25 (1) के साथ-साथ अनुच्छेद 26 को भी निरस्त करता है.
हंसारिया ने कहा कि उदाहरण के लिए, अगर कोई राज्य कानून बनाता है—तो मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत है. हंसारिया ने तर्क दिया, क्या उस कानून को इस आधार पर रद्द किया जा सकता है कि वह 26 (बी) का उल्लंघन करता है? सीजेआई ने कहा, भविष्य में कोर्ट फैसला सुनाने में बहुत हिचकिचाएंगेज्
सीजेआई ने आगे कहा, अगर इस देश के लोग, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये, एक आम आवाज उठाते हैं कि इस मुद्दे पर सामाजिक सुधार की जरूरत है, तो शायद कोर्ट इसे सामाजिक सुधार के तौर पर मान लेगा. लेकिन अगर यह लोगों की मर्जी और इच्छा के खिलाफ है — उन पर कुछ थोपा जाता है या, उन्हें चुप कराने के नियम के तौर पर, तो शायद कोर्ट दखल देगाज्
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