बिलासपुर, 16 मई (आरएनएस)। भारत में रेडियो प्रसारण का इतिहास केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के जागरण की गाथा है। इसी गौरवमयी इतिहास में आकाशवाणी बिलासपुर एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में स्थापित है, जिसने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, भाषा और जनभावनाओं को न केवल स्वर दिया, बल्कि उन्हें वैश्विक पहचान भी दिलाई।
बिलासपुर आकाशवाणी केंद्र के शिलान्यास कार्यक्रम की कुछ यादें और संस्मरण
मुझे अच्छी तरह से याद है जब पहली बार राष्ट्रपति के रूप में स्व ज्ञानी जैल सिंह जबव हमारे शहर बिलासपुर आए तो सारे शहर की सड़कें चकाचक और नई बना दी गईं थी। शहर के चारों तरफ स्वागत द्वार व पोस्टर लगाए गए एवं शहर की सुंदरता में कोई कोरकसर बाकी नहीं रखी गई थी। तब इस केंद्र की आधारशिला तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा सन (1983 84 ) में रखी गई थी। यह उस समय बिलासपुर के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि दिल्ली से सीधे राष्ट्रपति का आगमन शहर के सांस्कृतिक और सूचना जगत के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत था।निर्माण काल: शिलान्यास के बाद स्टूडियो की स्थापना, ट्रांसमीटर टावर का निर्माण और तकनीकी उपकरणों की व्यवस्था में कुछ वर्षों का समय लगा। फिर इसका विधिवत लोकार्पण व उद्घाटन और प्रसारण की शुरुआत 21 सितंबर, 1991 को हुई थी। इस आकाशवाणी केंद्र का उद्घाटन तत्कालीन केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अजीत कुमार पांजा के करकमलों से संपन्न हुआ था।उस समय देश में दूरदर्शन और आकाशवाणी के विस्तार की एक बड़ी लहर चल रही थी।
ज्ञानी जैल सिंह जी का बिलासपुर आगमन
मैं स्वयं बिलासपुर आकाशवाणी केंद्र की शिलान्यास अवसर का महती गवाह हूं। क्योंकि इस विशेष अवसर पर उपस्थित रहकर सारे कार्यक्रमों को प्रत्यक्ष देखने अनुभव करने का मुझे सौभाग्य मिला है ।मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब ज्ञानी जैल सिंह जी जब बिलासपुर आए थे, तब उनका व्यक्तित्व अपनी सरलता और ‘मिट्टी से जुड़ावÓ के लिए जाना जाता था। शिलान्यास समारोह के दौरान उन्होंने स्थानीय परिवेश और लोक भाषा के महत्व पर जोर दिया था। राष्ट्रपति के रूप में उनका छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश का हिस्सा) के इस अंचल में आना बिलासपुर की बढ़ती हुई सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्ता का प्रतीक था।
2. ‘न्यायधानीÓ का सांस्कृतिक उदय
1980 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में बिलासपुर अपनी एक विशिष्ट पहचान बना रहा था। शिलान्यास के बाद जब 1991 में केंद्र शुरू हुआ, तो इसने अरपा नदी के तट पर बसे इस शहर को एक नई आवाज़ दी। आकाशवाणी के आने से बिलासपुर के कवियों और लेखकों को अपनी रचनाएँ रिकॉर्ड करने और बड़े श्रोता वर्ग तक पहुँचाने का पहला सशक्त माध्यम मिला। फिर लोक संगीत के संरक्षण की दिशा में भी बहुत काम हुआ। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों (ददरिया, करमा, सुआ) को स्टूडियो की गुणवत्ता के साथ सहेजने का काम इसी केंद्र से गति पकड़ पाया। एक पत्रकार के रूप में मैं जहां तक समझता हूं कि जब उस दौर में इंटरनेट नहीं था। बिलासपुर आकाशवाणी केंद्र की स्थापना ने स्थानीय समाचारों के संकलन और उनके त्वरित प्रसारण की नई परंपरा शुरू की। इससे अंचल की समस्याओं और उपलब्धियों को राष्ट्रीय फलक पर जगह मिलने लगी।
स्थापना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के पश्चात ग्रामीण भारत को लोकतांत्रिक सूचना तंत्र से जोडऩे के उद्देश्य से रेडियो विस्तार की नीति अपनाई गई। मध्य भारत के प्रमुख सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र बिलासपुर में आकाशवाणी की स्थापना इस दिशा में एक युगांतरकारी कदम था। उस दौर में, जब संचार के साधन अत्यंत सीमित थे, बिलासपुर केंद्र ने ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखायÓ के ध्येय वाक्य को सार्थक करते हुए छत्तीसगढ़ी समाज की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनकर उभरा।
प्रमुख उपलब्धियाँ: सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम
आकाशवाणी बिलासपुर की यात्रा केवल प्रसारण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके प्रभाव बहुआयामी रहे हैं:लोकसंस्कृति का संरक्षण:
इस केंद्र ने छत्तीसगढ़ की अमूल्य लोकधरोहर जैसे पंथी, ददरिया, करमा, सुवा और लोकनाट्यों को एक सम्मानित मंच प्रदान किया। यदि रेडियो की तरंगें इन विधाओं को संरक्षण न देतीं, तो कई मौखिक परंपराएँ काल के गाल में समा सकती थीं।
छत्तीसगढ़ी भाषा का उत्थान
जिस समय राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और अंग्रेजी का प्रभुत्व था, बिलासपुर केंद्र ने छत्तीसगढ़ी और स्थानीय बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित कर जनमानस में भाषाई गौरव और आत्म-सम्मान जगाया।
कृषि और ग्रामीण विकास
‘खेत-खलिहानÓ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों तक उन्नत कृषि तकनीक, मौसम का पूर्वानुमान और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुँची। इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जागरूकता में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया।
सामाजिक पुनर्जागरण
स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और स्वच्छता जैसे विषयों पर निरंतर कार्यक्रमों ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना जगाई। विशेषकर पोलियो उन्मूलन, साक्षरता और कोविड-19 जैसी आपदाओं के दौरान इसकी भूमिका एक ‘जीवनरक्षकÓ की रही है।
साहित्य और बौद्धिक विमर्श का केंद्र
आकाशवाणी बिलासपुर ने स्थानीय साहित्यकारों, कवियों और विचारकों को एक प्रभावी मंच प्रदान किया। इसने न केवल क्षेत्रीय साहित्यिक चेतना को ऊर्जा दी, बल्कि लोकगीतों और लोककथाओं के विशाल संग्रह को अपने अभिलेखों में सुरक्षित कर सांस्कृतिक विरासत को भविष्य के लिए सहेज लिया।
आधुनिक दौर में प्रासंगिकता
आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचना के अनगिनत स्रोत उपलब्ध हैं, आकाशवाणी बिलासपुर की विश्वसनीयता और आत्मीयता कम नहीं हुई है। मध्यम तरंग (्ररू) से एफएम और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म तक की इसकी यात्रा तकनीकी अनुकूलन का उत्कृष्ट उदाहरण है। इंटरनेट और मोबाइल के युग में भी यह केंद्र छत्तीसगढ़ की मिट्टी की सौंधी महक और लोकजीवन की सहजता का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
आकाशवाणी बिलासपुर ने सिद्ध किया है कि तकनीक जब संस्कृति और जनहित से जुड़ती है, तो वह समाज का निर्माण करती है। पिछले नौ दशकों के भारतीय रेडियो इतिहास में बिलासपुर केंद्र का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। यह केंद्र आज भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का सशक्त प्रहरी है और आने वाली पीढिय़ों के लिए लोकध्वनि का जीवंत दस्तावेज बना रहेगा।
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