नई दिल्ली,19 मई (आरएनएस)। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) से धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नर्मदा नदी में दूध और साडिय़ां बहाए जाने की कथित घटनाओं पर रिपोर्ट मांगी है.
यह निर्देश न्यायाधिकरण की मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित केंद्रीय क्षेत्र की पीठ ने नर्मदा जल के संरक्षण और संवर्धन के लिए दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया.इस मामले की सुनवाई न्यायाधिकरण के न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने सोमवार को की.
याचिका के अनुसार, मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की नस्रुल्लागंज तहसील के सतदेव और भेरुड़ा गांवों में एक धार्मिक सभा का आयोजन किया गया था, जिसके दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के तहत लगभग 11,000 लीटर दूध और 210 साडिय़ां कथित तौर पर नर्मदा नदी में बहाई गईं.
आवेदकों ने तर्क दिया कि इस गतिविधि से नदी की पारिस्थितिकी, जलीय जीवों, सिंचाई स्रोतों और पेयजल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, और यह जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन हो सकता है.
ट्रिब्यूनल ने पाया कि नदी में दूध डालने से होने वाले प्रदूषण के संबंध में अभी तक कोई वैज्ञानिक डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया है. हालांकि, बेंच ने यह भी नोट किया कि जल अधिनियम की धारा 24 नदियों और कुओं में प्रदूषक पदार्थों के निर्वहन पर रोक लगाती है, और कार्बनिक पदार्थ जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) को बढ़ा सकते हैं, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हो सकता है.
ट्रिब्यूनल ने आगे कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नर्मदा नदी में दूध बहाने का मुद्दा सार्वजनिक और पर्यावरणीय बहस का विषय बन गया है और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों द्वारा इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है.
ट्रिब्यूनल ने सीपीसीबी और एमपीपीसीबी को विशेषज्ञ वैज्ञानिक डेटा प्राप्त करने और यह स्पष्ट करने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया कि क्या वर्तमान में ऐसी गतिविधियों को किसी दिशा-निर्देशों द्वारा नियंत्रित किया जाता है,क्या नए नियामक दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है, और क्या अनुष्ठानों के दौरान नदियों में दूध बहाने से जल प्रदूषण होता है.
आदेश में कहा गया है, आवेदन और संबंधित दस्तावेजों की प्रति क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल और सदस्य सचिव, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल को भेजी जाए ताकि वैज्ञानिक डेटा प्राप्त करने के बाद विशेषज्ञों से रिपोर्ट मंगाई जा सके और यदि किसी दिशा-निर्देश की आवश्यकता हो तो उचित प्रक्रिया अपनाकर रिपोर्ट को इस ट्रिब्यूनल को प्रस्तुत किया जाए. मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी,
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