नई दिल्ली,23 मई (आरएनएस)। किसी आरोपी को कानूनी सहायता (लीगल एड) देना सिर्फ एक औपचारिकता बनकर नहीं रह जाना चाहिए. यह एक ठोस और सार्थक प्रयास होना चाहिए जो वकील की प्रभावी मदद सुनिश्चित करे और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा करे. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की पीठ ने 22 मई को दिए अपने फैसले में यह टिप्पणी की.
पीठ ने कहा- हमने पाया कि हाई कोर्ट ने बिना किसी देरी के जल्द न्याय देने और अपील का तेजी से निपटारा करने की जल्दबाजी में, अपीलकर्ता (आरोपी) को यह सूचित करने का प्रयास भी नहीं किया कि उसकी ओर से कोई वकील न होने के कारण उसकी पैरवी के लिए एक न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया गया है.
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा भी नहीं लगता कि न्याय मित्र को जेल में बंद अपीलकर्ता से बातचीत करने का कोई अवसर मिला हो. पीठ ने कहा कि हालांकि हाई कोर्ट के लिए अपने वकील की अनुपस्थिति के बारे में अपीलकर्ता को सूचित करना कोई कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था, लेकिन फिर भी, यदि अपीलकर्ता को इस बारे में सूचित कर दिया जाता, तो यह एक समझदारी भरा और बेहतर कदम होता.
पीठ ने आगे कहा, इस कोर्ट द्वारा लगातार अपनाए गए इस रुख के आलोक में इसका महत्व और बढ़ जाता है कि किसी आरोपी व्यक्ति को कानूनी सहायता देना केवल एक रस्म या नाममात्र की औपचारिकता नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक ठोस और सार्थक प्रयास होना चाहिए जो वकील की प्रभावी सहायता सुनिश्चित करे.
पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि न्याय के हित को आगे बढ़ाने के लिए, वकील की अनुपस्थिति में दोषी का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक न्याय मित्र नियुक्त करने के हाई कोर्ट के नेक इरादे पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन सुनवाई और प्रतिनिधित्व की इस व्यवस्था के बारे में अपीलकर्ता को एक औपचारिक नोटिस जारी करना न्याय के उद्देश्यों को अधिक बेहतर ढंग से पूरा करता.
पीठ ने कहा, ऐसा रास्ता अपनाना तब और भी अनिवार्य हो जाता है जब वर्तमान मामले की तरह, अपीलकर्ता अपील के लंबित रहने के दौरान लगातार जेल में बंद रहा हो.
पीठ ने यह टिप्पणी 74 वर्षीय बुजुर्ग नंदकिशोर मिश्रा द्वारा दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए की, जिन्हें निचली अदालत ने हत्या के अपराध के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई है.
बेंच ने नोट किया कि न्याय मित्र को 20 नवंबर 2025 को नियुक्त किया गया था, और हाई कोर्ट ने 26 नवंबर 2025 को ही इस मामले का निपटारा कर दिया था. इस दौरान न तो आरोपी को अपील की सुनवाई के बारे में सूचित करने के लिए कोई नोटिस जारी किया गया और न ही न्याय मित्र ने उससे मुलाकात की.
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वह इस अपील पर नए सिरे से सुनवाई के लिए मामले को वापस भेजने का आदेश देने का इच्छुक है. बेंच ने कहा कि 26 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अपीलकर्ता की याचिका हाई कोर्ट की फाइल पर दोबारा जीवित हो जाएगी.
पीठ ने कहा कि इस फैसले के 2 महीने के भीतर किसी भी तारीख पर अपील को सुनवाई के लिए लिस्ट किया जा सकता है. उपलब्धता के आधार पर, अधिमानत: (बेहतर होगा कि) उसी डिवीजन बेंच के सदस्य जजों को इसे सुनने की जिम्मेदारी सौंपी जाए, जिन्होंने 26 नवंबर 2025 को अपील पर फैसला सुनाया था.
बेंच ने आगे कहा, यदि ऐसा करना संभव नहीं है या व्यावहारिक नहीं है, तो हम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करते हैं कि वे इस अपील को ऐसी डिवीजन बेंच को सौंपें, जिसमें कम से कम एक ऐसा जज शामिल हो, जिन्होंने पहले अपीलकर्ता की याचिका पर फैसला दिया था.
पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि अपीलकर्ता डिवीजन बेंच के सामने अपने खुद के वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व करना चाहता है, इसलिए यदि रजिस्ट्री द्वारा एक सप्ताह पहले सूचित की गई तारीख पर उनका वकील अपील पर बहस करने के लिए उपस्थित नहीं होता है, तो किसी न्याय मित्र को नियुक्त करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी.
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