कोलकाता 18 जून (आरएनएस)। हालिया चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर मतभेद और गहराते दिख रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता अरूप विश्वास और शीर्ष नेतृत्व के बीच दूरी लगातार बढऩे की बात सामने आ रही है। सूत्रों के अनुसार, तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई संगठनात्मक बैठकों में भी अरूप विश्वास की उपस्थिति बेहद सीमित रही है, जिससे अंदरूनी असंतोष की अटकलें तेज हो गई हैं।
इसी बीच तृणमूल के कोषाध्यक्ष के रूप में अरूप विश्वास ने बड़ा कदम उठाते हुए सम्बंधित बैंक की सेंट्रल प्लाजा शाखा को पत्र भेजकर पार्टी के बैंक खाते को फ्रीज करने की मांग की है। उनका कहना है कि पार्टी फंड के संचालन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम जरूरी है। इस मांग ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि आमतौर पर किसी पार्टी के भीतर ही कोषाध्यक्ष द्वारा ऐसे सार्वजनिक कदम कम ही देखने को मिलते हैं। अरूप विश्वास की इस मांग को ‘असली तृणमूलÓ के विपक्षी नेता ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन भी मिला है। पत्रकार वार्ता में ऋतब्रत ने कहा कि अरूप विश्वास के पत्र में गंभीर मुद्दा उठाया गया है और पार्टी फंड में पारदर्शिता की जांच जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि “इस खाते में कटमनी या अवैध धन नहीं है, इसकी क्या गारंटी है,” और खाते को फ्रीज करने की मांग का समर्थन किया। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व की कोशिश संगठन पर पकड़ मजबूत बनाए रखने की है। संसदीय और विधायी दल में आंतरिक टूट के संकेतों के बावजूद ममता बनर्जी लगातार बागी नेताओं पर कार्रवाई कर संगठन को फिर से मजबूत ढांचे में ढालने की कोशिश कर रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक पत्र या खाते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन और नियंत्रण की लड़ाई का हिस्सा है। पार्टी के वित्तीय ढांचे को लेकर भी लंबे समय से चर्चाएं चलती रही हैं, जहां फंड पर कालीघाट गुट के प्रभाव की बातें सामने आती रही हैं। हालांकि अब तक किसी भी गुट की ओर से औपचारिक रूप से फंड पर सीधा दावा नहीं किया गया था, जिससे यह मामला और अधिक संवेदनशील बन गया है। तृणमूल के भीतर इस नए विवाद ने संगठनात्मक संकट की आशंका को और बढ़ा दिया है। बैंक खाते को फ्रीज करने जैसी मांगें न केवल आंतरिक मतभेद को उजागर करती हैं, बल्कि आने वाले समय में पार्टी की एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर सकती हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह विवाद बढ़ा तो इसका असर राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
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