0-आर्थिक मदद का दुरुपयोग रोकने हाईकोर्ट का आदेश
जबलपुर,27 जून(आरएनएस)। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, अत्याचार निवारण) के दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में एसटी-एससी की महिलाओं को दुष्कर्म के मामले में मिलने वाली शासकीय आर्थिक मदद पर महत्वपूर्ण फैसला दिया है. इसमें उन्होंने पीडि़ता द्वारा बयान से न मुकरने और आरोपी से किसी भी तरह का समझौता नहीं करने का एफिडेविट पेश करने की बात कही है, जिससे इस एक्ट का दुरुपयोग न हो सके.
दरअसल, 18 जून को हाईकोर्ट में 2022 के दुष्कर्म मामले में सुनवाई हुई, जिसकी ऑर्डर कॉपी अब सामने आई है. इस ऑर्डर के मुताबिक जबलपुर के खमरिया थाना क्षेत्र में एसटी वर्ग की एक महिला ने अपने साथ हुए दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था, जिसके बाद दुष्कर्म की धाराओं के साथ प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, अत्याचार निवारण) भी लगाया गया था.
प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटी एक्ट में इस बात का प्रावधान है कि यदि अनुसूचित जाति या जनजाति की किसी महिला के खिलाफ दुष्कर्म का कोई मामला आता है, तो पीडि़त महिला को 5 लाख रु की आर्थिक सहायता सरकारी खजाने से दी जाती है. वहीं, 2022 के मामले की सुनवाई के दौरान पीडि़ता ने कोर्ट से मांग करते हुए कहा कि उसे अभीतक केवल 75 हजार रुक की सहायता ही मिली है.
प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटी एक्ट में इस बात का प्रावधान है कि एससी एसटी वर्ग की दुष्कर्म पीडि़ता को दिए जाने वाली आर्थिक सहायता तीन हिस्सों में दी जाती है. पहली 50त्न राशि मेडिकल एग्जामिनेशन में कंफर्मेशन होने के बाद, 25त्न चार्ट शीट दाखिल होने के बाद और बाकी 25त्न राशि ट्रायल खत्म होने के बाद दी जाती है. इस मामले में पीडि़ता ने कहा कि उसे सिर्फ 75 रु मिले हैं और उसे पूरा पैसा दिया जाए. इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पैनल लॉयर ने पीडि़ता द्वारा एफिडेविट पेश करने की मांग की. कोर्ट को बताया गया कि पूर्व के मामलों में 75त्न राशि मिलने के बाद पीडि़ता अपने बयान से मुकर जाती हैं या कंप्रोमाइज कर लेती हैं या होस्टाइल हो जाती हैं.
इस तर्क पर सहमति जताते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस विशाल मिश्रा ने कहा, कि नियम के तहत पीडि़त महिला को लगभग 75त्न की राशि दी जानी चाहिए लेकिन महिला को अपनी ओर से एक एफिडेविट देना होगा कि सहायता राशि लेने के बाद वह अपने बयान से नहीं मुकरेगी ना ही वह आरोपी से कोई समझौता करेगी.
जस्टिस विशाल मिश्रा के आदेश में आगे कहा गया, पीडि़ता को एफिडेविट में ये स्पष्ट लिखना होगा कि उसके द्वारा जो आरोप लगाए गए हैं, वह उसपर कायम रहेगी. यदि महिला 15 दिनों के भीतर ऐसा एफिडेविट दे देती है तो शासन की ओर से उसे बाकी राशि दे दी जाएगी. लेकिन जस्टिस विशाल मिश्रा ने कड़े शब्दों में यह भी कहा कि एफिडेविट नहीं देने पर याचिकाकर्ता को ये राशि प्राप्त नहीं होगी. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि एफिडेविट देने के बाद महिला कंप्रोमाइज कर लेती है, बयान से मुकर जाती है या होस्टाइल हो जाती है तो महिला के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होगा और पूरे पैसे की वसूली भी होगी.
सुनवाई के दौरान कोर्ट में ये तथ्य सामने आए कि ऐसे कई मामले आते हैं जिनमें दुष्कर्म का केस रजिस्टर होने के बाद मेडिकल रिपोर्ट और ट्रायल शुरू होने तक कथित पीडि़ता को 75 प्रतिशत राशि मुआवजे के रूप में दे दी जाती है लेकिन बाद में जब ट्रायल खत्म होता है तो महिला बयान से मुकर जाती है और आरोपी छूट जाता है. ऐसे मामले में शासन के खजाने से आम जनता के पैसा बर्बाद हो जाता है. इन्ही तथ्यों से सहमति जताते हुए एकलपीठ ने कहा है कि इसी वजह से अब पीडि़ता से एफिडेविट लेना जरूरी है, जिससे इस एक्ट और जनता के पैसे का दुरुपयोग न हो.
००
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

