पूनम भाटिया
रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, विश्वास से बनते हैं। और जब विश्वास ही हत्या का हथियार बन जाए, तब केवल एक व्यक्ति नहीं मरता, इंसानियत भी घायल होती है।
पिछले कुछ समय में देश ने ऐसे कई मामले देखे हैं जिन्होंने समाज को भीतर तक झकझोर दिया। हाल के सिया-केतन प्रकरण में जाँच एजेंसियाँ प्रेम, सगाई और कथित साजिश के पहलुओं की जाँच कर रही हैं। इससे पहले सोनम-राजा रघुवंशी हत्याकांड लंबे समय तक चर्चा में रहा। उससे पहले श्रद्धा वालकर हत्याकांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था, जिसमें लिव-इन पार्टनर पर हत्या और शव के टुकड़े करने का आरोप लगा। दिल्ली का चर्चित “नीला ड्रम” मामला भी लोगों के मन में आज तक भय पैदा करता है। इन सभी मामलों की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं और अंतिम न्यायिक निर्णय अपनी प्रक्रिया से होगा, लेकिन एक बात समान दिखाई देती है और वह है-भरोसे का टूटना।
विश्वास की परिभाषा सरल है-किसी पर निर्भर होना और उसके साथ सुरक्षित भविष्य की उम्मीद रखना। लेकिन जब वही भरोसा धोखे में बदल जाता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता; उसके साथ परिवार, सामाजिक रिश्ते और मानवीय संवेदनाएँ भी आहत होती हैं। सिया-केतन जैसे मामलों में व्यक्तिगत संबंधों के साथ आर्थिक और भावनात्मक जटिलताएँ भी सामने आती हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि किन चेतावनी संकेतों को अनदेखा किया गया और किसने किसके विश्वास का लाभ उठाया।
यह केवल अपराध की कहानी नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जिसके सहारे कोई अपना भविष्य किसी दूसरे के साथ जोड़ता है। जब जीवन का सबसे सुरक्षित रिश्ता ही सबसे बड़ा खतरा बन जाए, तो समाज को आत्ममंथन करना ही होगा।
अधिकांश विश्वासघात निजी और पारिवारिक रिश्तों में होते हैं। प्रेम, सहजीवन और वैवाहिक संबंध सुरक्षा का आधार होने चाहिए, लेकिन जब इन्हीं का दुरुपयोग होता है तो पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है। प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, स्वीकार है। विवाह का अर्थ बंधन नहीं, साझेदारी है। यदि किसी रिश्ते में प्रेम, सम्मान और विश्वास समाप्त हो जाए, तो अलग होने के लिए कानून, संवाद, परिवार और समाज, सभी रास्ते उपलब्ध हैं। किसी का जीवन छीन लेने का अधिकार किसी को नहीं हो सकता।
आज सोशल मीडिया पर अपराधों की खबरें सनसनी बनकर फैलती हैं। कई बार लोग अपराधी की चालाकी या उसकी योजना पर ऐसे चर्चा करते हैं, मानो वह कोई रोमांचक कहानी हो। यह प्रवृत्ति भी चिंताजनक है। हर ऐसी खबर के पीछे किसी माँ का उजड़ा आँगन, किसी पिता का टूटा सहारा और किसी परिवार का आजीवन दर्द छिपा होता है। ऐसे अपराध केवल कानूनी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि समाज में भय, संदेह और असुरक्षा भी बढ़ाते हैं।
विश्वासघात केवल हत्या तक सीमित नहीं है। झूठ बोलना, भावनाओं से खेलना, आर्थिक शोषण करना, दोस्ती या प्रेम के नाम पर धोखा देना, ये उसी मानसिकता के अलग-अलग रूप हैं। जब छोटे छल को सामान्य मान लिया जाता है, तभी बड़े अपराधों की जमीन तैयार होती है।
इस समस्या का समाधान केवल कठोर कानून नहीं हैं। सामाजिक जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आसान पहुँच, रिश्तों में पारदर्शिता और घरेलू हिंसा के विरुद्ध प्रभावी सहायता तंत्र भी उतने ही आवश्यक हैं। शिक्षा-प्रणाली को बच्चों में ईमानदारी, संवेदनशीलता और संवाद का संस्कार विकसित करना होगा। मीडिया को भी जाँच प्रक्रिया और पीडि़तों की गरिमा का सम्मान करते हुए जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
हमें अपने बच्चों को केवल सफल होना नहीं, बल्कि विश्वसनीय होना भी सिखाना होगा। रिश्तों में ईमानदारी, असहमति में संवाद और अलगाव में गरिमा ही सभ्य समाज की पहचान है। रिश्ता टूटने का दर्द समय के साथ कम हो सकता है, लेकिन जब इंसान का इंसान पर से भरोसा टूट जाता है, तब उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी हार यही है।
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