नई दिल्ली 10 Jully (Rns): न्याय प्रणाली में होने वाली देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गहरी चिंता जताते हुए बेहद सख्त और तीखी टिप्पणी की है। गुरुवार को एक पुराने मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मुकदमे की रफ्तार इतनी धीमी है कि इस पर एक ‘घोंघा’ भी सवाल उठा सकता है। अदालत ने हैरानी जताते हुए कहा कि यह मुकदमा साल 2015 में दायर किया गया था, लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद 2026 तक भी इसमें वादी के साक्ष्य (सबूत) ही दर्ज किए जा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ एक निजी कंपनी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस कंपनी ने फरवरी 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। दरअसल, कंपनी ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अर्जी लगाकर लंबित मुकदमे में कुछ नए और अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने और एक गवाह को दोबारा जिरह (पूछताछ) के लिए बुलाने की मांग की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस अर्जी को खारिज कर दिया था। आपको बता दें कि यह मूल मुकदमा मई 2015 में दायर हुआ था और बाद में जनवरी 2018 में इसे वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत ‘वाणिज्यिक मुकदमे’ के रूप में दर्ज कर लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की कंपनी की अपील
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कंपनी की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कंपनी की इस दलील को भी अमान्य कर दिया कि नए दस्तावेजों की अहमियत पर विचार किया जाना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जिन दस्तावेजों को अब रिकॉर्ड पर लाने की कोशिश की जा रही है, वे मुकदमा दायर होते समय भी कंपनी के पास मौजूद थे और बाद में जब अतिरिक्त साक्ष्य पेश किए गए, तब भी वे कंपनी के पास ही थे।”
टुकड़ों में कार्यवाही को नहीं दी जा सकती मंजूरी
पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि अगर इस तरह के आवेदनों को बार-बार मंजूरी दी गई, तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि अदालत वाणिज्यिक मुकदमों में टुकड़ों-टुकड़ों में कार्यवाही करने के तरीके को बढ़ावा दे रही है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि कंपनी को इससे पहले एक बार अतिरिक्त सबूत रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी जा चुकी है। यह अनुमति 30 जनवरी 2018 को दी गई थी, लेकिन उसी आधार पर दूसरा आवेदन सालों बाद नवंबर 2023 में दायर किया गया। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया है कि इस मुकदमे पर जितनी जल्दी संभव हो सके, अंतिम फैसला सुनाया जाए।

