नई दिल्ली, 15 नवम्बर (आरएनएस)। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि वह क्रिप्टो-आस्तियों को न तो नियंत्रित करना चाहता है और न ही उन पर प्रतिबंध लगाने की योजना रखता है। वहीं कई अन्य नीतिगत बयान बताते हैं कि सरकार बिना आधार वाली क्रिप्टो-आस्तियों पर टैक्स लगाकर उनके इस्तेमाल को हतोत्साहित करना चाहती है और उन्हें औपचारिक समर्थन नहीं देना चाहती। इसके बावजूद, भारत दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता क्रिप्टो बाज़ार बना हुआ है। यही बात नीति-निर्माताओं के सामने एक कठिन सवाल खड़ा करती है—क्रिप्टो को कैसे नियंत्रित किया जाए, बिना उसे पूरी तरह वैध मान्यता दिए? इस चुनौती का समाधान कई तरीकों से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, चीन ने अपने मुख्य भूभाग में क्रिप्टो पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, लेकिन हांगकांग को निवेश और नवाचार का बड़ा केंद्र बनने की छूट दी है। इससे चीन को क्रिप्टो उद्योग को दूर से निगरानी में रखने में मदद मिलती है, वो भी बिना उसे औपचारिक मान्यता दिए। भारत के पास हांगकांग जैसा कोई ‘नीतिगत बफर’ तो नहीं है, लेकिन इसी तरह की भूमिका स्व-नियामक संस्थाएँ (SROs) निभा सकती हैं, जो उद्योग की निगरानी “एक दूरी से” कर सकती हैं। दुनिया भर में SRO मॉडल का इस्तेमाल नवाचार और निगरानी के बीच संतुलन बनाने के लिए किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, जापान की फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ एजेंसी ने Japan Virtual and Crypto Assets Exchange Association को क्रिप्टो क्षेत्र के लिए आधिकारिक SRO माना है। यह संस्थान सभी सेवा प्रदाताओं के लिए नियम तय करता है, ऑडिट करता है, सदस्यों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है और उपभोक्ता शिकायतों को देखता है। कुल मिलाकर, SRO भारत के लिए एक तरह की ‘नीतिगत सुरक्षा झिर्री’ (policy safety valve) की तरह काम कर सकता है—एक ऐसा तंत्र जिसमें सरकार उद्योग की निगरानी तो कर सकती है, पर उसे औपचारिक वैधता दिए बिना। यदि भारत एक औपचारिक SRO को मान्यता देता है, तो वह क्रिप्टो क्षेत्र की विकास-यात्रा को संरचित, जवाबदेह और सुरक्षित तरीके से दिशा दे सकेगा, जबकि सीधी सरकारी नियमावली की आवश्यकता भी कम होगी।
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