ओम प्रकाश गुप्ता
आज की वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में, जहाँ न्यायसंगत वेतन, सम्मानजनक कार्य और श्रमिक संरक्षण टिकाऊ विकास के मूल तत्व हैं, वेतन संहिता, 2019 भारत के लिए प्रवर्तन से सुविधा की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को इंगित करती है। वियतनाम जैसे अनेक? विकासशील देशों के उदाहरण दर्शाते हैं कि समयबद्ध और सुविचारित श्रम सुधार किस प्रकार सामाजिक न्याय को सुदृढ़ करते हुए आर्थिक वृद्धि को गति दे सकते हैं। वियतनाम में न्यूनतम वेतन सुधार और श्रमिकों की सुरक्षा के संवर्धित उपायों सहित श्रम कानूनों के किए गए बदलावों की बदौलत विदेशी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और औपचारिक रोजगार में निरंतर वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने लगातार इस बात पर बल दिया है कि न्यायसंगत वेतन प्रथाओं को सुनिश्चित करना विशेष रूप से गरीबी उन्मूलन, सम्मानजनक कार्य और समावेशी आर्थिक विकास से संबंधित लक्ष्यों सहित सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्ति के लिए आवश्यक है । साथ ही, दुनिया भर के व्यवसायों ने अत्यधिक नियामक बोझ, जटिल अनुपालन संरचनाओं, और दंडात्मक प्रवर्तन के बारे में चिंता भी व्यक्त की है, जो तेजी से बदलते वैश्विक बाजार में उनकी प्रगति और प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता में बाधा उत्पन्न करते हैं।
दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने और वैश्विक श्रम बाजार में अहम प्रतिभागी होने नाते भारत इन चुनौतियों से अछूता नहीं है। औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही क्षेत्रों में कार्यरत विशाल कार्यबल (53.53 करोड़) के साथ (आर्थिक समीक्षा, 2021-22), देश ने लंबे समय तक श्रमिकों के लिए वेतन में बराबरी सुनिश्चित करने और नियोक्ता ओं के लिए अनुपालन के ढाँचे को आसान बनाने की दोहरी चुनौती का सामना किया है।
वेतन से जुड़े अनेक कानूनों (वेतन भुगतान अधिनियम, 1936; न्यू।नतम वेतन अधिनियम, 1948; बोनस भुगतान अधिनियम, 1965; और समान पारिश्रमिक अधिनियम,1976) और उनके ओवरलैपिंग प्रावधानों तथा उन्हें लागू करने में आने वाली मुश्किलों की वजह से अक्सर नियोक्तागओं के लिए भ्रम, दोहराव और अनुपालन की चुनौतियाँ उत्पकन्नस होती थीं। इन कमियों ने आर्थिक उत्पादकता और श्रमिकों के कल्याण दोनों में बाधा उत्पतन्नी की। वेतन संहिता, 2019 इन चारों मौजूदा कानूनों को एक ही सुव्यवस्थित ढाँचे में समेकित कर इन समस्याओं को हल करती है। यह सरलीकरण वेतन मानकों की एक जैसी परिभाषाएँ और लगातार अनुपालन सुनिश्चित करता है, जिससे गैर-ज़रूरी ओवरलैप खत्म होते हैं और नियोक्ताहओं के लिए अनुपालन आसान हो जाता है, साथ ही श्रमिकों को समय पर और न्यातयसंगत वेतन की गारंटी मिलती है। यह संहिता प्रशासनिक जटिलता को कम करके, पारदर्शिता, दक्षता और नियोक्तान-कर्मचारी संबंधों में बेहतरी को बढ़ावा देने के प्रति लक्षित है। इस तरह, वेतन संहिता, भारत का अपनी श्रम नीतियों को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाने का प्रयास है। जो यह सुनिश्चित करती है कि श्रमिकों की सुरक्षा और व्यावसायिक दक्षता दोनों का एक-दूसरे को मज़बूत करते हुए साथ-साथ आगे बढ़े।
वेतन की एकसमान परिभाषा: वेतन संहिता, 2019 के तहत लाया गया एक मुख्य सुधार वेतन की एक समान और पूरी परिभाषा को अपनाया जाना है, जो पहले के विभाजित दृष्टिकोण की जगह लेता है, जिसमें हर श्रम कानून की अपनी अलग परिभाषा थी। इस असंगतता के कारण नियोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों के लिए अक्सर भ्रम, मुकदमेबाजी और अनुपालन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न होती थीं, क्योंकि एक ही शब्द वेतन विभिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग अर्थ रखता था। परिभाषा को मानकीकृत करके, वेतन संहिता वेतन गणना में ज़्यादा पारदर्शिता और प्रशासनिक सरलता लाएगी। अब यह एकसमान परिभाषा स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करती है कि वेतन में क्या-क्या शामिल होगा, जिसमें मूल वेतन, महंगाई भत्ता और प्रतिधारण भत्ता शामिल हैं, जबकि बोनस, गृह किराया भत्ता और ओवरटाइम भुगतान जैसे खास घटकों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। नियोक्ता के लिए, यह नियामक स्पष्टता और अनुपालन में आसानी देती है, जिससे सभी क्षेत्रों में ज़्यादा पारदर्शी और न्यायसंगत वेतन संरचना को बढ़ावा मिलता है।
निरीक्षक – सुविधा प्रदाता के रूप में : वेतन संहिता, 2019 की एक बड़ा बदलाव लाने वाली विशेषता निरीक्षकों की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना है। पहले के कानूनों के तहत, निरीक्षक मुख्य रूप से लागू करने वाले या प्रवर्तक के तौर पर काम करते थे, जिससे अक्सर नियोक्ता ओं के साथ उनके रिश्ते टकरावपूर्ण हो जाते थे। दुनिया भर में, नियामक प्रणालियों में नियमों के सख्त प्रवर्तन के स्था न पर उनमें सुविधा देने का बदलाव आया है, जहाँ नियामक अब नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने में भागीदार के तौर पर काम करते हैं। इस वैश्विक प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए, वेतन संहिता, 2019 निरीक्षक की भूमिका को निरीक्षक-सह- सुविधा प्रदाता के रूप में पुनर्परिभाषित करती है, जिसका आशय है कि निरीक्षकों को अब सिर्फ लागू करने वाले के तौर पर नहीं, बल्कि सुविधा प्रदाता के तौर पर देखा जाता है; जो नियोक्तोओं के लिए मार्गदर्शक, शिक्षक और सहयोगी के रूप में काम करते हैं। अब उनकी भूमिका में व्यवसायों को नियमों को समझने और उनका पालन करने में मदद करना और नियमों का पालन बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञ परामर्श देना शामिल है।
नियंत्रण से सुविधा प्रदाता की ओर इस बदलाव का उद्देश्यन परस्परर विश्वोस कायम करना और सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के साथ तालमेल बिठाना है, इस तरह यह संहिता सहयोगात्मक नियमन और नियोक्ता्ओं और नियामक अधिकारियों के बीच अविश्वास को कम करने पर ज़ोर देती है। साझेदारी को बढ़ावा देकर, यह संहिता नियोक्ताि के लिए अनुपालन को आसान बनाती है। श्रम कानूनों का बेहतर पालन करने के लिए प्रोत्साहित करती है। यह उत्तरदायी विनियमन की ओर वैश्विक प्रवृत्ति से भी मेल खाती है, जहाँ अनुपालन की नींव बातचीत और भरोसे पर आधारित है।
गैर-अपराधिकरण और स्तरित दंड (या ग्रेडेड पेनल्टी) : इस संहिता के सबसे स्वागतयोगय सुधारों में से एक है अपराधों को गैर-आपराधिक बनाना। पहले, वेतन से जुड़े उल्लंघन अक्सर लंबी आपराधिक कार्यवाही की ओर ले जाते थे, जो नियोक्ता्ओं के लिए चिंता और देरी का कारण बनते थे। नई रूपरेखा में पहले अनुपालन करने का तरीका अपनाया जाता है, जिससे नियोक्तोओं को अत्यधिक दंडित किए जाने के बजाय गलतियों को सुधारने में मदद मिलती है।
वेतन संहिता में स्तरित दंड या ग्रेडेड पेनल्टी सिस्टम शुरू किया गया है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दंड को उल्लंघन की गंभीरता के मुताबिक निर्धारित किया जाए । यह अपराधों की गंभीरता के आधार पर दंड को श्रेणियों में बांटकर, यह संहिता प्रवर्तन में निष्पक्षता, आनुपातिकता और न्याय को बढ़ावा देने की ओर लक्षित है। छोटी-मोटी गलतियों पर अब कड़ा दंड नहीं मिलेगा, जबकि गंभीर उल्लंघनों पर अब भी उचित दंड दिया जाएगा।
अपराधों को संयोजित या कंपाउंड करना: अपराधों को संयोजित करने का प्रावधान नियोक्तार को लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से बहुत ज़रूरी राहत देता है। पुराने ढाँचे में मामूली, प्रक्रियात्मक गलतियों के लिए भी आपराधिक दंड लगाया जाता था, जिससे लंबी कानूनी प्रक्रिया और नियोक्ताकओं में डर उत्प न्नत होता था। अपराधों को संयोजित करने के तरीके के तहत, कुछ अपराधों को निर्धारित प्राधिकरण को सीधे दंड देकर निपटाया जा सकता है, जो तय अधिकतम जुर्माने के 50त्न के बराबर होता है (धारा 56)। यह सुधार कानूनी देरी को काफी कम करेगा, समाधान प्रक्रिया को आसान बनाएगा, और बिजऩेस को मुकदमेबाजी के खर्चों और अनिश्चितताओं से बचाएगा। नियोक्तार अब बिना किसी रुकावट के अपना काम जारी रखते हुए विवादों को कुशलता से सुलझा सकते हैं।
डिजिटल अनुपालन – कारोबार करने में आसानी: ऐसी दुनिया में जहाँ डिजिटल परिवर्तन तेजी से बढ़ रहा है, नियामक प्रणालियाँ अधिकारीय अड़चनों को कम करने के लिए उसके अनुकूल हो रही हैं। वेतन संहिता इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड-कीपिंग शुरू करके और एकल पंजीकरण और एक रिटर्न फाइलिंग के ज़रिए अनुपालन को आसान बनाकर भारत को इस वैश्विक प्रवृत्ति के साथ जोड़ती है। पहले, व्यिवसाय को विभिन्न वेतन-संबंधी कानूनों के तहत विविध पंजीकरण, फाइलिंग और बहुत सारी कागजी कार्रवाई का सामना करना पड़ता था।
नई प्रणाली इन ज़रूरतों को एक सुचारु डिजिटल प्रक्रिया में बदल देती है। इस आधुनिकीकरण से प्रशासनिक बोझ कम होगा, समय और संसाधन बचेंगे। डिजिटल समाधान को बढ़ावा देकर यह सुधार ‘कारोबार करने को सुगम बनाना’ के व्यालपक एजेंडे में योगदान देगा और एक प्रतिस्पर्धी वैश्विक अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत की स्थिति को मज़बूत करेगा।
संतुलित श्रम इकोसिस्टिम बनाना: वेतन संहिता, 2019 सिफऱ् श्रमिकों के लिए मात्र सुधार से कहीं बढ़कर है। यह नियोक्तािओं के लिए भी एक बड़ा कदम है, जिन्हें वेतन से जुड़ी अपनी जि़म्मेदारियों का निर्वहन करने में स्पकष्ट ता, दक्षता और सहायता मिलती है। निरीक्षकों के सुविधा प्रदाता के तौर पर काम करने, अपराधों को गैर-आपराधिक बनाने, स्तरित दंड या ग्रेडेड पेनल्टी, अपराधों को संयोजित करने के प्रावधान और डिजिटल अनुपालन के साथ, यह संहिता निष्पक्षता और जवाबदेही बनाए रखते हुए कारोबार के लिए अच्छा माहौल बनाती है। जैसे-जैसे भारत खुद को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर स्थापित कर रहा है, श्रमिकों के अधिकारों और नियोक्ता ओं के काम में आसानी के बीच संतुलन बनाना बहुत ज़रूरी है। दोनों पक्षों की चिंताओं को दूर करके, यह संहिता ज़्यादा सामंजस्यपूर्ण और प्रगतिशील श्रम बाजार के लिए आधार तैयार करती है, जहाँ अनुपालन को बढ़ावा दिया जाता है, विवादों में कमी आती है, और आर्थिक विकास सामाजिक न्याय एक साथ सुनिश्चित होता है।
यहाँ इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक है कि वर्तमान में उत्पाद और उसकी पैकेजिंग के डिज़ाइन में अक्सर बदलाव करना पड़ता है, जो ग्राहक की मांग पर निर्भर करता है। यदि निर्धारित अवधि में आपूर्ति किए जाने वाले उत्पाहद की मांग ज़्यादा है, तो ऐसी स्थिति में श्रमिक बल को काम के सामान्यप घंटों से ज़्यादा समय तक काम करना पड़ सकता है, जिसके लिए उन्हें ओवर टाइम भुगतान करके सही मुआवज़ा दिया जाएगा। यदि काम के घंटों में कोई कोई सीमा निर्धारित है, तो नियोक्ता को नए कामगार रखने पड़ते हैं जो शायद काम के माहौल से परिचित न हों और उन्हें कार्य वातावरण के अनुकूल बनने में समय लगेगा, जिससे उत्पादन क्षमता पर असर पड़ेगा और उत्पादों की अस्वीकृति होगी, इसलिए, उत्पादन की समय सीमा को देखते हुए मौजूदा कार्यबल को आवश्यकता अनुसार अतिरिक्त समय काम करने की अनुमति दी जा सकती है।
वेतन संहिता, 2019 अपनी श्रम नीति को आधुनिक बनाने की दिशा में भारत का निर्णायक कदम है, जो वैश्विक स्तर पर अधिक न्यायसंगत, सरल और दक्ष नियमन की मांग के अनुरूप है। अनुपालन को आसान बनाकर, प्रक्रिया को डिजिटाइज़ करके, तथा नियोक्ता्ओं और नियामकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर, यह संहिता भारतीय श्रम पद्धति को निष्पक्षता और उत्?पादकता के अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ जोड़ती है। यह वेतन संहिता महज एक कानूनी सुधार से कहीं बढ़कर है, जो वेतन कानून को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय दोनों के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में नए सिरे से परिभाषित करती है। यह एक ऐसे श्रम इकोसिस्टम की नींव रखती है जो मज़दूर-केंद्रित और कारोबार के अनुकूल दोनों है, जो भारत के विकसित भारतञ्च2047 की ओर बढऩे के लिए बहुत ज़रूरी है। भारत तेज़ी से जटिल होते वैश्विक माहौल का सामना कर रहा है; जिसमें व्यापार में बदलाव, बढ़ते टैरिफ और बढ़ती आय असमानताएँ हैं। ऐसे में वेतन संहिता का समय पर और प्रभावी कार्यान्वयन ज़रूरी हो जाता है। यह एक पारदर्शी, अनुमानित नियामक ढाँचा तैयार करेगी जो निवेशकों का विश्वास बढ़ाएगा, औपचारिकता को प्रोत्साहित करेगा और श्रमिकों के कल्याण को को बढ़ावा देगा।
लेखक अखिल भारतीय महासचिव, लघु उद्योग भारती हैं।
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