हरदीप सिंह पुरी
रायपुर 17 नवंबर (आरएनएस) | बिहार ने ऐसा जनादेश दिया है, जिसका अर्थ सीटों की गणितीय व्याख्या से कहीं आगे जाता है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 243 में से 202 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अकेले 89 सीटें जीतकर राज्य में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दर्ज किया। दशकों तक क्षेत्रीय गठबंधनों के सहारे राजनीति में प्रभाव बनाए रखने वाला महागठबंधन अब 34 सीटों तक सिमट गया है। 7.4 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 67.13 प्रतिशत मतदान के साथ यह चुनाव हालिया समय के सबसे प्रतिस्पर्धी चुनावों में से एक रहा और लोकतांत्रिक परिपक्वता को प्रभावशाली ढंग से सामने लाया।
लंबे समय तक बिहार को एक जड़ता वाले राज्य के रूप में देखा गया, जहाँ चुनाव जातिगत समीकरणों की गणना तक सीमित समझे जाते थे। किंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजनीति का फोकस विकास, समावेशी शासन और राज्य क्षमता पर केंद्रित हुआ है, जिसे बिहार के मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। 2025 का फैसला दर्शाता है कि मतदाता आकांक्षी है और उसने असुरक्षित, पिछड़े बिहार और बेहतर शासन वाले बिहार के बीच का अंतर प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया है। कई नागरिकों ने माना कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यह चुनाव जिम्मेदारी की भावना के साथ आया, और उन्होंने तय किया कि देश की प्रगति में बिहार को किस स्थान पर देखना है।
अच्छे शासन ने इस परिवर्तन की नींव रखी। एक दशक में 55,000 किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कों का निर्माण/उन्नयन हुआ, जिससे गांवों का जुड़ाव बाजार, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं से मजबूत हुआ। केंद्र व राज्य की पहलों से लाखों परिवारों को बिजली, पेयजल और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराई गई। सौभाग्य योजना के तहत 35 लाख से अधिक घरों में बिजली पहुँची। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 57 लाख पक्के घर स्वीकृत हुए, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं के नाम दर्ज है। ये आँकड़े जमीनी बदलावों का प्रमाण हैं — स्थायी सड़क, लगातार जलती रोशनी, नियमित पेयजल और गरिमा देने वाला आवास।
कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के साथ पुरानी सामाजिक-राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई। विविध समाज वाला बिहार अब राजनीतिक रूप से अपने समुदायों तक सीमित नहीं रहा। विभिन्न वर्गों की महिलाएँ सुरक्षा, आजीविका और अवसरों को लेकर समान अपेक्षाएँ रखती हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमियों के युवा एक ही कोचिंग सेंटरों और रोजगार बाज़ारों में एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। रोज़मर्रा के अनुभव उनकी आकांक्षाओं को साझा बनाते हैं और राजनीति से रोजगार, बुनियादी ढाँचे और निष्पक्षता पर जवाब मांगते हैं।
जनादेश ने वंशवाद-आधारित राजनीति को भी स्पष्ट संदेश दिया है। विरासत और पारिवारिक नेटवर्क पर टिकी पार्टियों की प्रभाव-सीमा सिमट रही है। बिहार लंबे समय से ऐसे मॉडलों का साक्षी रहा है और उनकी सीमाओं को महसूस कर चुका है। 2025 के परिणाम बताते हैं कि मतदाता इस बात पर अधिक ध्यान दे रहा है कि नेता शासन में कैसा व्यवहार करते हैं, संकट में कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करते हैं। राष्ट्रीय गठबंधन में पारिवारिक पृष्ठभूमियाँ हों तो भी संगठनात्मक क्षमता और सेवा का रिकॉर्ड ही असली कसौटी बनता जा रहा है।
युवा मतदाताओं ने इस बदलाव को सबसे अधिक गति दी है। बिहार देश की सबसे युवा जनसंख्या वाले राज्यों में से है और 2000 के बाद जन्मे लाखों युवाओं ने पहली बार मतदान किया। वे ऐसे भारत में पले हैं जहाँ एक्सप्रेसवे, डिजिटल भुगतान, प्रतिस्पर्धी संघवाद और तेज़ी से लागू होने वाली योजनाएँ सामान्य हैं। वे राज्यों की तुलना करते हैं, घोषणाओं को परखते हैं और वादों के क्रियान्वयन की गति से नेताओं का मूल्यांकन करते हैं। उनके लिए समय पर बनी सड़क और कागज़ों में अटकी सड़क के बीच का अंतर बिल्कुल स्पष्ट है।
यह पीढ़ी राष्ट्रीय एकता के प्रति भी सजग है। वे ऐसे विमर्श से सावधान रहते हैं जो संस्थाओं को कमजोर करता है, अलगाववाद को बढ़ावा देता है या राष्ट्रीय सुरक्षा को हल्का आँकता है। बेरोज़गारी और असमानता जैसे मुद्दों पर वे आलोचनात्मक विमर्श करते हैं, परंतु राष्ट्रहित और अव्यवहारिक नकारात्मकता के बीच स्पष्ट सीमाएँ खींचते हैं। बिहार का जनादेश यही समझ दर्शाता है — विकास और राष्ट्रीय उद्देश्य को समान महत्व देने वाले विकल्प को चुनना।
कानून-व्यवस्था में सुधार भी इस जनादेश का केंद्रीय पक्ष है। एक समय के बूथ-कब्जे और हिंसा वाले चुनाव अब बेहतर सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के कारण शांतिपूर्ण हुए हैं। उग्रवाद कमजोर पड़ा है। दुकानदार देर तक दुकानें खोलते हैं, छात्र निर्भयता से यात्रा करते हैं और परिवार सामाजिक जीवन में सुरक्षित महसूस करता है। ऐसे परिवर्तनों को अनुभव करने वाला मतदाता मतदान करते समय इन्हें अनदेखा नहीं कर सकता।
विपक्ष के कुछ हिस्सों की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक है। समर्थन में कमी का आत्मविश्लेषण करने के बजाय चुनाव आयोग और कार्यप्रणाली पर संदेह जताना मतदाताओं की समझ का अपमान है। वही संस्थागत ढाँचा अन्य राज्यों में विपक्ष के पक्ष में भी परिणाम देता रहा है। मतदाता, जिस व्यवस्था का उसने उत्साह से उपयोग किया है, उससे गंभीर संवाद की अपेक्षा रखता है।
राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भ में, बिहार का फैसला भारत में उभरते व्यापक पैटर्न को पुष्ट करता है। दुनिया के कई लोकतंत्रों में ध्रुवीकरण और संस्थागत संकट बढ़ रहे हैं, वहीं भारत ने उच्च भागीदारी और स्थिर नेतृत्व के साथ विकास-केंद्रित मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ना जारी रखा है। बिहार का जनादेश इस यात्रा को और मजबूती देता है। बिहार के जागरूक मतदाता समझते हैं कि उनकी प्रगति 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़ी हुई है।
एनडीए के लिए यह जनादेश प्रेरणा भी है और जिम्मेदारी भी। यह अवसंरचना, कल्याण, सेवा-प्रदान और सुरक्षा पर उसकी नीति की पुष्टि करता है, पर साथ ही तेज़ी से रोजगार सृजन और गहन सुधारों की अपेक्षाएँ भी रखता है। विपक्ष के लिए यह संदेश है कि रणनीति, नेतृत्व और एजेंडा को नए सिरे से समझना होगा। बिहार ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता अब शासन, उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय एकता पर आधारित राजनीति चाहता है — और यही आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वरूप तय करेगा।

