ऋषिकेश,23 नवंबर (आरएनएस)। पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंकÓ ने कहा कि जो समाज अपने साहित्यकारों और साहित्य को भूल जाता है, वह समाज कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की साहित्यिक संस्थाओं के बीच व्यापक समन्वय तथा अधिक संयुक्त आयोजनों की आवश्यकता पर बल दिया। रविवार को थानो स्थित लेखक गांव में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। मुख्य अतिथि पूर्व केंदीय मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंकÓ ने कहा कि उत्तराखंड के साहित्यकारों ने न केवल हिंदी, बल्कि भारतीय साहित्य को व्यापक रूप से समृद्ध किया है। लेखक गांव देश के सभी राष्ट्रीय एवं प्रदेश स्तरीय भाषा संस्थानों और अकादमियों के साथ एमओयू हस्ताक्षर कर रहा है, जिसके माध्यम से सभी संस्थाओं को एक ही मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने उत्तराखंड और देश के प्रमुख साहित्यकारों से आग्रह किया कि वे साहित्यिक, सांस्कृतिक और कला-केंद्रित गतिविधियों के लिए लेखक गांव के मंच का उपयोग करें। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की डॉ. अमिता दुबे ने कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साहित्यकारों और उनके साहित्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों प्रदेशों की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने हिंदी संस्थान की गतिविधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया और उत्तराखंड के लेखकों से राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए आवेदन करने का आग्रह किया। पूर्व कुलपति डॉ. सुधारानी पांडेय ने कहा कि हिंदी साहित्य की भावभूमि वैदिक साहित्य से जुड़ी है। उत्तराखंड के साहित्यकारों की रचनाओं को गहराई से समझने के लिए संस्कृत साहित्य की समझ भी आवश्यक है। पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. सविता मोहन ने उम्मीद जताई कि दो दिनों के इस आयोजन में उन महान साहित्यकारों के अवदान पर गंभीर विमर्श एवं उनके कार्य का दस्तावेजीकरण होगा, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य की सेवा में समर्पित किया है। लेखक और नैनीताल के डीएम ललित मोहन रयाल ने उत्तराखंड में साहित्यिक मानचित्रण (लिटरेरी मैपिंग) की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने उत्तराखंड के हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि तथा प्रमुख लेखकों की लेखन एवं चिंतन शैली का विस्तार से विश्लेषण प्रस्तुत किया।
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