जयदीप यादव
कोलकाता 28 नवंबर (आरएनएस)। कहते हैं कि, उस देश की सरहद को कोई छू नहीं सकता जिस पर निगाहबान हैं आंखें। ऐसे में जिस देश की समुद्री सरहद पर देशवासियों की रखवाली कोरा व खंजर करे तो फिर एक-एक देशवासी अपने घरों में चैन की नींद सो सकता है। इंडियन नेवी के 2 प्रमुख युद्धपोत ईस्टर्न नेवल कमांड पहुंचे हैं। मिसाइलों से लैस आईएनएस खंजर और आईएनएस कोरा की तस्वीर सामने आई हैं, जो काफी भयानक है। दोनों युद्ध पोत समुद्री ऑपरेशन से लौटे हैं। इन्हें कोलकाता में स्थित ईस्टर्न नेवल कमांड पर नेवी वीक के तहत बुलाया गया है। दोनों युद्धपोत नेवी वीक के तहत जनता से जुड़ाव का हिस्सा हैं। इस कार्यक्रम के तहत आम लोग दोनों युद्धपोतों को देख सकेंगे। इंडियन नेवी के अधिकारियों से मुलाकात और बातचीत कर सकेंगे। इस कार्यक्रम के जरिए समंदर में भारत की शक्ति का एहसास आम जनता को होगा। भारतीय नौसेना के दो महत्वपूर्ण कार्वेट हैं, जिन्होंने दशकों तक हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और रणनीतिक वर्चस्व को मजबूत किया है। कोरा अपनी घातक मिसाइल क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। वहीं खंजर तटीय सुरक्षा और बहुउद्देशीय अभियानों में लगातार प्रभावी रहा है। दोनों जहाज भारत की समुद्री शक्ति की रीढ़ हैं। आईएनएस कोरा (क्क61) भारतीय नौसेना के स्वदेशी कार्वेट कार्यक्रम का ऐसा स्तंभ है जिसने 1998 में बेड़े में शामिल होने के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री शक्ति को नए स्तर पर पहुंचाया। जीआरसी कोलकाता में बने इस जहाज का मुख्य उद्देश्य सतह युद्ध और तटीय सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसकी चुस्त डिजाइन, तेज गति और खतरों पर त्वरित प्रतिक्रिया देने की क्षमता इसे खास बनाती है। यह न केवल भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बल्कि पड़ोसी देशों के साथ संयुक्त अभ्यासों में भी सक्रिय रहता है। इससे यह क्षेत्रीय स्थिरता का आवश्यक हिस्सा बन चुका है। कोरा के रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और सेंसर आधुनिक मानकों पर खरे उतरते हैं, जो इसे रात-दिन किसी भी समुद्री संघर्ष के लिए तैयार रहते हैं. यह हथियार विन्यास कार्वेट श्रेणी में इसे सबसे संतुलित और शक्तिशाली बनाता है। कोरा भारतीय नौसेना की आत्मनिर्भरता के प्रयासों का प्रतीक माना जाता है। बता दे कि, खंजर (क्क47), 1991 में कमीशन हुआ और खुखरी क्लास के तहत विकसित जहाजों में से एक महत्वपूर्ण कार्वेट है। यह मझगांव डॉक द्वारा बनाया गया था और उस दौर में भारतीय नौसेना के तटीय युद्ध कौशल को बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया था। खंजर अपनी संतुलित डिजाइन और विश्वसनीय परिचालन क्षमता के कारण तीन दशकों से अधिक समय तक पूर्वी नौसेना कमान का मजबूत हिस्सा रहा है. बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में इसकी निरंतर उपस्थिति भारत के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। यह युद्धक गश्ती और निगरानी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके सेंसर और संचार प्रणाली इसे अन्य जहाजों के साथ कुशल समन्वय स्थापित करने में सक्षम बनाती है। इससे यह संयुक्त अभ्यासों और हाइ-टेम्पो ऑपरेशंस में भी व्यापक योगदान देता है।
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