देहरादून,29 नवंबर (आरएनएस)। बलभद्र खलंगा विकास समिति की ओर से आयोजित 51 वां खलंगा मेला साइकिल रैली और चंद्रयानी मंदिर में पूजा अर्चना के साथ शुरू हो गया। शनिवार की सुबह स्वास्थ्य जागरुकता, पर्यावरण संरक्षण, संवर्द्धन का संदेश देने के लिए सहस्त्रधारा रोड से खलंगा युद्ध कीर्ति स्तंभ तक खलंगा बहादुरी साइकिल रैली निकाली गई। बलभद्र खलंगा विकास समिति अध्यक्ष कर्नल विक्रम सिंह थापा, आर्कियालॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक डॉ.मोहन चंद्र जोशी, गोर्खाली सुधार सभा अध्यक्ष पदम सिंह थापा, समिति उपाध्यक्ष बीनू गुरूंग, सचिव प्रभा शाह ने सहस्त्रधारा रोड स्थित खलंगा युद्ध स्मारक में पुष्पाजंलि अर्पित करते हुए वीरों को श्रद्धांजलि दी। समिति अध्यक्ष कर्नल विक्रम थापा सिंह ने हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। साइकिल रैली का नेतृत्व पहाड़ी पैडलर्स एवं दून बाइक राइडर्स के कर्नल अनिल गुरूंग ने किया। साइकिल रैली के बाद नालापानी स्थित चंद्रयानी मंदिर नाला पानी देहरादून में हवन पूजन के बाद भण्डारे का आयोजन किया गया। सचिव प्रभा शाह ने बताया कि खलंगा मेला रविवार को रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ सागरताल में होगा। मौके पर पंडित कॄष्णा पंथी, कर्नल सीबी थापा, कर्नल एमबी राना, राम सिंह थापा, कै.वाईबी थापा, संजय थापा, एलबी गुरूंग, महेश भूषाल, राम सिंह थापा, कर्नल डीएस खड़का, शमशेर थापा, सुनीता गुरूंग, गोपाल क्षेत्री, अशोक बल्लभ शर्मा, राकेश उपाध्याय, अनिल थापा, राजू गुरूंग मौजूद रहे।
आंग्ल-गोरखा युद्ध का गवाह खलंगा: नालापानी पहाड़ी के सबसे ऊंचे शिखर पर गोर्खाली सेनानायक वीर बलभद्र थापा और उनके वीर सैनिकों का सुदृढ़ खलंगा युद्ध स्मारक मौजूद है। जहां सन 1814 में 600 गोर्खाली सैनिक उनकी वीरांगनाओं ने सेनापति बलभद्र थापा के नेतृत्व में तीन बार अंग्रेजों के आक्रमण को विफल किया था। गोर्खालियों ने सिर्फ भरवा बंदूक, धनुष -बाण, घुयेत्रो, भाला-बरछी और खुखरी से लगभग 3500 से भी अधिक आधुनिक हथियारों एवं गोला बारूद से लैस अंग्रेजों का सामना बहादुरी से किया। पहले ही दिन अंग्रेज सेनानायक जनरल गिलेस्पी को मार डाला। अंग्रेजों ने किले की घेराबंदी कर रसद पानी रोक दिया। बाद में बलभद्र थापा खुद ही अपने सैनिकों के साथ किला छोड़कर ये कहकर निकले कि वह हारे नहीं, अपनी मर्जी से जा रहे हैं।
खुले जंगल में है चंद्रयानी मंदिर: बलभद्र थापा नालापानी के चंद्रयानी मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना करते थे। यह मंदिर खुले जंगल के बीचों बीच है। यह माना जाता है कि इस मंदिर पर किसी भी छत जैसा निर्माण टिकता नहीं। समिति ने वन विभाग से मंदिर की चारदीवारी बनाने की मांग की है।
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