शिक्षा विभाग की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल, उच्च न्यायालय ने लिया संज्ञान, लगाई फटकार
बाराबंकी 10 दिसंबर (आरएनएस )। स्थानीय सिटी इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत शिवचरन गौतम के खिलाफ गंभीर आरोपों का मामला उत्तर प्रदेश के शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़ा कर रहा है। अभिलेखों के अनुसार, शिवचरन गौतम ने वर्ष 2001 में माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड से चयनित होकर जनता जनार्दन इंटर कॉलेज, गांधी नगर, गाजीपुर में संस्कृत प्रवक्ता के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। इसके बाद उन्होंने बी.एड. सत्र 2001-02 में संस्थागत छात्र के रूप में उत्तीर्ण की जबकि उसी समय वे नियमित सेवा में थे। इस अवधि में उन्होंने न तो एक वर्ष का अनिवार्य अवैतनिक अवकाश लिया और न ही संस्था प्रबंधक से संबंधित अनुमति प्राप्त की, जो सेवा नियमों के उल्लंघन का स्पष्ट संकेत है। विदित हो कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी द्वारा जारी गोपनीय सूचना पत्रों (दिनांक 25.10.2024 एवं 20.11.2024) में यह पुष्टि की गई कि शिवचरन गौतम ने संस्थागत छात्र के रूप में परीक्षा दी थी। यह तथ्य सेवा पुस्तिका में दर्ज जानकारी से मेल नहीं खाता और प्रथम दृष्टया अवैधानिक प्रतीत होता है। दूसरी ओर, आरटीआई के तहत पूर्व संस्था के प्रबंधक द्वारा उपलब्ध कराई गई तिथिवार सूचना में उनकी बी.एड. अध्ययन अवधि के लिए अनुमति प्राप्त होने का कोई रिकॉर्ड नहीं पाया गया। सूत्रों की माने तो वर्ष 2020 में शिवचरन गौतम को जनता जनार्दन इंटर कॉलेज से कई गंभीर आरोपों में निलंबित कर दिया गया था। जिसमें कक्षा 11 की छात्रा से अनैतिक आचरण, ड्रेस क्रय में वित्तीय अनियमितता, प्रबंधक के अधिकारों में हस्तक्षेप तथा मिड डे मील योजना में गड़बड़ी शामिल थीं। निलंबन के समय जनवरी-फरवरी 2020 का उनका वेतन भी रोका गया था। इन परिस्थितियों के बावजूद, वे 06.01.2022 को सिटी इंटर कॉलेज बाराबंकी में प्रधानाचार्य नियुक्त किए गए। चयन सूची में वे तीसरे स्थान पर थे और प्रथम-द्वितीय अभ्यर्थियों के सेवानिवृत्त होने पर उन्हें पदभार सौंपा गया। नियुक्ति से पूर्व उन्होंने 100 रूपए के स्टाम्प पर शपथपत्र देकर यह आश्वस्त किया था कि यदि किसी भी प्रकार से उनके शैक्षिक प्रमाणपत्र गलत पाए जाते हैं, तो वे सम्पूर्ण वेतन वापस करेंगे और प्रशासनिक या दंडात्मक कार्रवाई से संबंधित कोई आपत्ति नहीं उठाएंगे। बाद में, स्कूल प्रबंधन द्वारा आरोपों की जांच एवं तथ्यों के आधार पर शिवचरन गौतम की सेवा समाप्ति का प्रस्ताव पारित किया गया और उसे अनुमोदन के लिए जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय भेजा गया। परंतु डीआईओएस ओपी त्रिपाठी द्वारा सेवा समाप्ति प्रस्ताव को अनानुमोदित कर दिया गया। इससे असंतोष बढ़ा और प्रबंध समिति ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने रिट याचिका संख्या ए-12819/2025 में सुनवाई के बाद 10 नवंबर 2025 को डीआईओएस द्वारा किया गया अनानुमोदन आदेश निरस्त कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी की कि डीआईओएस ने स्थापित नियमों एवं शिक्षा सेवा नियमावली का गंभीर उल्लंघन किया। जानकारी केे मुताबिक इसी वर्ष 20 अगस्त 2025 को शासन ने फर्जी अंकपत्रों वाले 22 शिक्षकों को सेवा से बर्खास्त कर दिया था, जिनमें बाराबंकी जिले के भी 7 शिक्षक शामिल थे। इसके बावजूद, आरोप लगाया जा रहा है कि डीआईओएस द्वारा गौतम के मामले को अलग तरह से देखा जा रहा है और उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। इस पूरे प्रकरण ने शिक्षा विभाग की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। अब देखना यह है कि शासन इस गंभीर मामले पर क्या कार्रवाई करता है, और क्या सचमुच फर्जी डिग्री पर चयनित एक प्रधानाचार्य को अधिकारिक संरक्षण देने वालों पर भी कार्रवाई होगी।
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