नई दिल्ली ,25 दिसंबर (आरएनएस)। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सैनिकों को सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री से अवगत रखना है, ताकि वे वहां चल रहे नेरेटिव और सूचनाओं को समझ सकें। यदि कोई जवान सोशल मीडिया पर कोई भ्रामक, संदिग्ध या फर्जी (स्नड्डद्मद्ग) पोस्ट देखता है, तो उसे तुरंत अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित करना होगा। सेना का मानना है कि इससे ‘इन्फॉर्मेशन वारफेयरÓ यानी सूचना युद्ध और दुष्प्रचार के खिलाफ आंतरिक सतर्कता को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में ‘हनी ट्रैपÓ और अनजाने में संवेदनशील जानकारी लीक होने के कई मामले सामने आए थे, जिसके बाद से सुरक्षा कारणों से सोशल मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे।
हाल ही में ‘चाणक्य डिफेंस डायलॉगÓ के दौरान सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस मुद्दे पर विस्तार से बात की थी। उन्होंने जेन-जी (त्रद्गठ्ठर्-ं) पीढ़ी और सोशल मीडिया के विरोधाभास को एक चुनौती मानते हुए कहा था कि आज के दौर में स्मार्टफोन एक जरूरत बन गया है। सैनिक दूर-दराज के इलाकों में तैनात रहते हैं, ऐसे में बच्चों की स्कूल फीस भरने, माता-पिता की तबीयत जानने या पत्नी से बात करने के लिए फोन अनिवार्य है। सेना प्रमुख ने ‘रिएक्टÓ (प्रतिक्रिया) और ‘रिस्पॉन्डÓ (जवाब) के अंतर को समझाते हुए कहा था कि हम नहीं चाहते कि हमारे सैनिक जल्दबाजी में किसी ऑनलाइन बहस में उलझें, इसलिए उन्हें एक्स (ट्विटर) और अब इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर सिर्फ देखने की अनुमति दी गई है, वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की नहीं।
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