जौनपुर 2 जनवरी (आरएनएस )। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन संदेशों को बताते हुए स्थानीय मीडिया सहायक उदय नारायण जायसवाल ने कहा कि हम नए संकल्प लेते हैं, पर वास्तविक परिवर्तन तभी सार्थक होता है जब वह भीतर से आए। संत आत्ममंथन द्वारा सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं और निरंकार को सर्वोपरि मानते हुए सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन की प्राथमिकता बनाते हैं। कहा कि एक भक्त की यही कामना होती है कि हर नया वर्ष उसे पहले से अधिक सेवा, सुमिरन और सत्संग से जोड़े, साथ ही वह अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को भी पूरी निष्ठा से निभाए। जब जीवन स्वयं संदेश बन जाए और कर्म शब्दों से अधिक बोलें, तभी सच्ची साधना का स्वरूप प्रकट होता है। इसी क्षण में, पूरी चेतन अवस्था के साथ, निरंकार के एहसास में जीना ही वास्तविक जीवन है, क्योंकि भूत और भविष्य माया का रूप हैं। जब मन में यह विश्वास दृढ़ हो जाए कि कल भी दातार की रजा थी और आज भी उसकी कृपा है, तो चिंता स्वत: समाप्त हो जाती है और जीवन सहज और संतुलित बन जाता है। मनमुटाव और द्वेष से दूर रहकर, दूसरों के भावों को समझते हुए, दोषों पर पर्दा डालकर गुणों को अपनाना ही सच्ची भक्ति है। हर श्वास में सुमिरन हो, हर क्षण में निरंकार का वास हो, यही नववर्ष का सच्चा अर्थ और संदेश है।
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