डॉ. सुधीर सक्सेना
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल -“आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रणेता भारतेन्दु हरिशचंद्र ने जब यह बात कही थी, तब वह सभ्यता और संस्कृति के मर्म को उद्घाटित क रहे थे। देश-दुनिया पर नजर डालें तो हम सहज ही समझ सकते हैं कि विदेशी या विजातीय भाषा किस तरह वैयक्तिक, सामूहिक और राष्ट्रीय विकास में अवरोध व विकार उत्पन्न करती है। वह असमान विकास, जातीय और भौगोलिक संघर्षों और अनेक विभेदों को जन्म देती है। बहुधा वह भाषायी समूह या समूहों में हीनता बोध भी उत्पन्न करती है।
10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस है। औपनिवेशिक काल में हिन्दी प्रवासी श्रमिकों या गिरमिटियों के जरिये अनेक देशों में पहुँच गई थी, लेकिन हिन्दी को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करने का महत्वपूर्ण और अपूर्व उपक्रम सन 1975 में तब हुआ, जब मराठीभाषी साहित्यकार अनंत गोपाल शेवड़े ने नागपुर में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया। इस आयोजन में दुनिया के तमाम देशों से लोग आये। इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया था। लोठार लुत्थे और ओदोलन स्मेकेल जैसे विद्वानों और अभिमन्यु अनत जैसे लेखकों से मेरी मुलाकात वहीं हुई थी। बहरहाल, हिन्दी की महत्ता को तो बरसों पहले से सारे मनीषी बूझ रहे थे, किन्तु इस दिशा में सबसे ठोस और प्रभावी उपक्रम महात्मा गांधी ने किया वह सन 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उदघाटन के लिये इंदौर आये थे। उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात कही ओर समस्त भारतीय भाषाओं के लिए एक लिपि (देवनागरी) की अनिवार्यता की बात भी की। उनके शिष्य काका कलेलकर ने इस दिशा में काफी प्रयास किये। यह भारतीय भाषाओं के प्रति अनुराग से उपजा साहस ही था कि स्वतंत्रता की बेला में जब बीबीसी का संवाददाता उनसे साक्षात्कार के लिये पहुंचा तो उन्होंने साहसपूर्वक दो टूक कहा कि जाओ, दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया।
इस बात में शक नहीं कि हिन्दी वैश्विकता के सन्दर्भ में हमें एक नहीं अनेक गांधी चाहिये। हमें बहुत सारे गांधियों की आवश्यकता है। यदि हमें हिन्दी चाहिये तो हमें बहुत सारे गांधी चाहिये, जो सविनय – साग्रह देश-देशांतर में हिन्दी का विस्तार कर सकें। भाषा के विविध आयाम होते हैं। वह अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं है, वरन संस्कृति का सेतु, सम्पर्क साधन और अस्मिता का प्रतीक भी है। वैश्विक मंच पर वह किसी देश की पहचान भी है। गौर करें कि आज वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की स्थिति क्या है? विश्व के सर्वाधिक आबादी के देश की सर्वाधिक व्यवहृत भाषा यूएनओ में पैठ तो दूर, प्रवेश से वंचित है। विश्व हिन्दी सम्मेलन दुनियाभर के हिन्दी प्रेमियों के जमावड़े हैं, लेकिन वे योरोप, अफ्रीका अथवा लातिनी अमेरिका में हिन्दी के प्रति उत्सुकता जगाने में कमोबेश विफल रहे हैं। हिन्दी सिर्फ अकादेमिक संस्थाओं में पढ़ाये जाने तक सीमित है। सन 70 की परवर्ती दहाई में लौटें तो बहुत कुछ स्वागतेय हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी ने चार अक्टूबर सन 1977 को संयुक्त राष्ट्र संघ में पहला भाषण दिया था और यह भाषण उन्होंने हिन्दी में दिया था। इसके बाद उन्होंने 10 अक्टूबर और 24 सितंबर, 1998 में यूएनओ में भाषण दिया। पहले दो भाषण उन्होंने बतौर विदेश मंत्री दिये और तीसरा भाषण उन्होंने बहैसियत प्रधानमंत्री दिया। गौरतलब है कि उन्होंने अपना पहला भाषण हिन्दी में दिया था, मगर बाद के दोनों भाषण उन्होंने अंग्रेजी में दिये। क्यों? प्रश्न महत्वपूर्ण है। उत्तर तलाशिये। बहुत कुछ समझ में आ जायेगा। प्रसंगवश यह भी मायने रखता है कि विदेश नीति में, विदेश मंत्रालय में और दुनिया के तमाम देशों में स्थित भारत के दूतावासों में हिन्दी की क्या हैसियत है? इन संकायों में हिन्दी में सोचने, हिन्दी में बोलने और हिन्दी में प्रश्नोत्तरी की क्या स्थिति है?
10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस है। इसका इकलौता उजला पक्ष यह है कि यह वैश्विक संदर्भों में हिन्दी की महत्ता और स्वीकार्यता को व्यक्त करता है, किन्तु इसके साथ-साथ हिन्दीजनों के सम्मुख कई कर्त्तव्य और चुनौतियां भी खड़ी करता है। क्या कोई अन्य दिवस अपनी भाषा से जुड़ा दिवस मनाता है? चीन में मंदारिन, रूस में रूसी, स्पने में स्पेनिश, फ्रांस में फ्रेंच या इस्रायल में हिब्रू डे मनाया जाता है? ये सारे देश राजनीतिक उथलपुथल के भी शिकार रहे हैं। स्वाभिमानी नागरिक न सिर्फ अपनी भाषा को जीवित रखते हैं, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा और परिमार्जन में कोई कोर कसर नहीं उठा रखते। यहाँ हिन्दी भाषी देश की सीमाओं के भीतर ही हीनताबोध से ग्रस्त नजर आते हैं। वे प्रतिष्ठित मंचों पर हिन्दी बोलने में लजाते हैं। हिन्दी पट्टी की सांस्कृतिक राजधानी प्रयाग से निकले ‘बिग बी’ बालीवुड में ज्यों-ज्यों कामयाबी की सीढ़िया चढ़ते हैं, समारोहों में हिन्दी की जगह अंग्रेजी बोलते दीखते हैं। सिनेमा हो या खेल हो या कोई और क्षेत्र अधिकांश सेलीब्रिटीज अंग्रेजी बोलने में फख्र महसूस करते हैं। भाषा से जुड़ा एक और पहलू यह भी कि विज्ञान या चिकित्सा की शिक्षा और दुनिया में हिन्दी की स्थिति क्या है? शोधार्थियों या जिज्ञासुओं के लिये कितनी स्तरीय व प्रामाणिक सामग्री हिन्दी में उपलब्ध है? क्या हम हिन्दी भाषियों को सन्दर्भ जुटाने के लिये अंग्रेजी की शरण में नहीं जाना पड़ता? इस पर भी गौर करें कि नौकरशाही और कार्पोरेट की दुनिया में हिन्दी की क्या स्थिति है? क्या वहां हिन्दी की अर्जियां सकारी जाती हैं अथवा हिन्दी में संवाद को तरजीह दी जाती है? भाषा बहता नीर है, लेकिन आज भाषा के साथ क्या सलूक हो रहा है हिन्दी और उर्दू परस्पर हमजोली हैं, लेकिन भाषा की शुद्धता के नाम पर हिन्दी को दुर्बल और हास्यास्पद बनाने का तमाशा जारी है। भाषा को धर्म या संप्रदाय से जोड़ना नितांत आत्मघाती और मूढ़ता का परिचायक है। जरूरत भाषा को बचाने और अर्थगर्भी बनाने की की नहीं, अधिक से अधिक व्यवहार से उसे व्यापक, गहरा और अर्धगर्भी बनाने की है। सच है कि समाज भाषा को बनाता है और भाषा को समाज बनाती है। दोनों ठौर उदारता और खुलापन जरूरी है। वसुधैव कुटुबकम के लिये उदारचरित जरूरी शर्त है। भाषा पंचमेल खिचड़ी की तरह है। उसमें तरह-तरह के रंग, स्वाद और महक की दालें मिलाइये, लेकिन उसे गर्द और कंकड़ों से बचाये रखना होगा। आज हिन्दी में पत्र-पत्रिकाओं की क्या स्थिति है? नामीगिरामी लोकप्रिय पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। बीसवीं शती में हिन्दी के कई जागृत केंद्र थे; बम्बई, कलकत्ता, हैदराबाद से लेकर लखनऊ, वाराणासी, इलाहाबाद, भोपाल, इंदौर, पटना, कानपुर और अनेक। आज इन केन्द्रों की क्या स्थिति है? डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय सही कहते थे कि केन्द्रों की बहुलता हिन्दी-जगत को भास्वर करती थी। हिन्दी का पाट चौड़ा है, लेकिन गहरा, निर्मल और प्रवहमान नहीं, जबकि वह विकेंद्रित होकर ही बच और बढ़ सकेगी। हिन्दी के किसी साहित्यकार को नोबेल पुरस्कार नहीं मिलना भी विचारणीय है। यूनेस्को ने सन 2003 में दिल्ली को विश्व पुस्तक राजधानी चुना था। दो दहाई बाद भी क्या दिल्ली दुनिया में सिरमौर है?
तो 10 जनवरी को हम विश्व हिन्दी दिवस मनाने के अधिकारी है या नहीं और उसके तकाजों को कितना पूरा कर रहे हैं? हिन्दी अपने घर प्रवासिनी है या नहीं का उत्तर भी आप ही देंगे।
0000
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

