जुगनुओं की तरह झिलमिलाया रहा अतीत और आज
मौजूदा सदी में आए मिजऱ्ा ग़ालिब
प्रयागराज 11 जनवरी (आरएनएस)। उर्दू के महान शायर मिजऱ्ा ग़ालिब को समकालीन समय से संवाद में लाने वाला नाटक ‘फऱेब-ए-हस्तीÓ रंगमंच पर नए और आकर्षक प्रयोग के रूप में सामने आता है। विवश करता फंतासी और यथार्थ के बीच आवाजाही करता यह नाट्य प्रस्ताव एक रोचक हादसे के बहाने ग़ालिब को आज की दिल्ली में ला खड़ा करता है, जहाँ आधुनिक जीवन की विडंबनाएँ, समय की विसंगतियाँ और सत्ता की शंकाएँ आदि उनके साथ एक अजीब-सी टकराहट रचती हैं।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह हल्की-फुल्की विडंबना खुफिय़ा तंत्र, पहचान और इतिहास की राजनीति से टकराती हुई गहरे नाटकीय प्रश्नों में बदल जाती है। इस नाटक का बेहद प्रभावी मंचन बैकस्टेज संस्था की ओर से किया गया। निर्देशन प्रवीण शेखर ने किया। नाट्य आलेख प्रो. सादिक का लिखा हुआ है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से इस नाटक के दो प्रदर्शन रविंद्रालय प्रेक्षागृह में किए गए।
बैकस्टेज नाट्य समूह का यह रोचक और मोहक रंग प्रयोग अतीत और वर्तमान के रिश्तों पर नए सिरे से सोचने को भी विवश करता है।
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