प्रयागराज 12 जनवरी (आरएनएस)। अनुसूचित जाति के भूमिहीन खेतिहर मजदूर जो पुस्त दर पुस्त तालाब के खाते पर मकानात बनाकर रहते रहे चले आ रहे हैं। तालाब के खातों पर बने आवासों के अलावा उनके पास कहीं दूसरे आवास नहीं है। जमीदारी विनाश अधिनियम की दफा-9 व दफा-123 के तहत ऐसे भूखंड के भूमिहीन खेतिहर मजदूर कानूनन मलिक, कब्जेदार व दाखिलकार हो गए हैं तथा आबादी से आच्छादित भूखंडों के कब्जेदार के हक में बंदोबस्तित हो गई है तथा आवासीय भूखण्ड कब्जेदारो के हक में ऐसे सेटल्ड हो गए हैं जैसे दफा- 195 जमींदारी विनाश अधिनियम के तहत दे देना स्वीकार की गई है।
दुर्भाग्य है कि राजस्व विभाग के कर्मचारी व अधिकारी पुस्त दर पुस्त से बने दलितों के आवासो को मौके के अनुसार आंख रहते हुए भी दर्ज न करने की आदत बना लिए है। जिसका खामियाजा दलितों को भुगतना पड़ रहा है तथा अधिकारी भी दलित विरोधी है। ऐसी स्थिति में तहसीलदार बेदखली की नोटिस जारी करते रहते है। इस आधार पर की दलितों की आबादी से आच्छादित भूमि कागजात सरकारी में तालाब दर्ज है जबकि आबादी वाला हिस्सा तालाब है जबकि आबादी वाला हिस्सा न तालाब है और न तालाब की जलमग्न भूमि है बल्कि समतल परती की शक्ल में तालाब के भीटो पर है। चिंता की बात है कि तालाब खाते पर आवाद ऐसे भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के पास आवास बनाने तक भूमि नहीं है तो खेती करने के लिए जमीन बोने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसीलिए भूमिहीन खेतिहर मजदूर दलित होने की सजा भुगत रहे हैं।
लगता है कि जैसे भूमिहीन दलित इस देश और समाज की समस्या बन गए है। जिसे शासन जिसका समाधान नहीं कर सकता। बेदखली के बाद इन्हें कहां और किस देश में भेजा जाएगा भूमिहीन दलित को इस अंधेरे में भी रखा गया है।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

