नकुल कुमार मंडल
सागर द्वीप 14 जनवरी (आरएनएस)। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गंगा सागर की तीर्थयात्रा और स्नान करने का विशेष महत्व है। देश दुनिया में गंगा सागर ही एक मात्र स्थल है जहां सागर से गंगा मिलती है यानी इसी गंगा व सागर के स्थल को गंगा सागर कहते है। आज मकर संक्रांति के दिन गंगासागर में ‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बारÓ का नारा लगाते हुए देश के कोने-कोने से पुण्यार्थियों ने जहां मोक्ष की डूबकी लगाई। वहीं पुण्य डुबकी लगाने के बाद कपिलमुनि के दर्शन-पूजन कर जीवन मरण के चक्र से मुक्ति की कामना की। गंगा सागर में गोदान करवा रहें पुरोहितों ने बताया कि गंगा सागर को महातीर्थ का दर्जा प्राप्त है। ऐसे में देश के विभिन्न भागों से आये पुण्यार्थियों को यहां संगम क्षेत्र में जप-तप, दान पुण्य, तर्पण व गउदान करते देखा गया। मान्यता है कि इस शुभ दिन पर स्नान करने से 100 अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। गंगासागर क्षेत्र सागर, सुपरीडांगा, अंगूनबाड़ी, घोड़ामारा, लोहाचड़ा जैसे कथित द्वीपों से बना है। यहां आये बिहार के दरभंगा जिले से आए एक पुरोहित ललन झा ने बताया कि, ऋंगवेद, भागवद, रामायण, महाभारत व पुराणों में गंगासागर स्थित कपिलमुनि ऋषि का उल्लेख मिलता है। यह यही जगह है जहां धर्मराज युधिष्ठिर भी यहां स्नान के लिये आये थे। गंगासागर में गोदान कराने के लिए बिहार, झारखण्ड और ओडिशा से पंडित आते हैं। गोदान कराने के लिए यहां आकर मेले का पास बनाना पड़ता है। उक्त लोग यहां गउ या फिर बछिया किराए पर लेते हैं। ऐसे में मात्र एक माह में वह लोग 50 से 1.5 लाख तक कमा लेते हैं। पण्डितों ने बताया कि, एक ऐसा भी दौर था जब धार्मिक कारणों से लोग यहां सागर व गंगा की संगम स्थली में अपने संतान का विसर्जन भी कर देते थें । लेकिन मार्कस वायलेसी ने वर्ष 1802 में उक्त परम्परा पर सख्ती से रोक लगा दिया। संतान का विसर्जन की बात का उल्लेख कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता ‘विसर्जनÓ में है। स्थानीय लोगों व दस्तावेजों से पता चलता है कि पाल, गुप्त व सेन राजाों ने यहां राज किया था। महाकवि कालीदास से लेकर कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में गंगासागर का उल्लेख मिलता है।

