नई दिल्ली , 17 जनवरी (आरएनएस) । दक्षिण अफ्रीका में हाल ही में हुई जी 20 बैठक के दौरान जारी नेताओं की घोषणा ने क्रिप्टो परिसंपत्तियों और वित्तीय नवाचार को लेकर वैश्विक सोच में एक अहम बदलाव के संकेत दिए हैं। अब तक सतर्क नजर से देखे जाने वाले क्रिप्टो, स्टेबलकॉइन और एआई आधारित वित्तीय मॉडल को जी 20 ने औपचारिक रूप से वैश्विक वित्तीय प्रणाली का हिस्सा मान लिया है। इसके साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि इनका असर वित्तीय स्थिरता, प्रणाली की ईमानदारी और आम लोगों के भरोसे पर पड़ता है। घोषणा के अनुच्छेद 68 और 69 में इस संतुलित रुख को साफ तौर पर देखा जा सकता है। एक ओर, क्रिप्टो परिसंपत्तियों और स्टेबलकॉइन को लेकर फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (FSB) की सिफारिशों का समर्थन किया गया है, वहीं दूसरी ओर यह भी कहा गया है कि जोखिमों को समझते और नियंत्रित करते हुए नवाचार को आगे बढ़ने से नहीं रोका जाना चाहिए। यह रुख पहले की जी 20 चर्चाओं से अलग है, जहां बहस इस बात तक सीमित रहती थी कि क्रिप्टो को स्वीकार किया जाए या नहीं। अब क्रिप्टो बाजारों को एक स्थापित वास्तविकता मानते हुए सवाल यह है कि सीमा-पार स्तर पर इन्हें एकसमान तरीके से कैसे विनियमित किया जाए, ताकि नियमों में असमानता से प्रणालीगत जोखिम न पैदा हों। एफएसबी की भूमिका इस प्रक्रिया में अहम मानी जा रही है। क्रिप्टो परिसंपत्तियों और वैश्विक स्टेबलकॉइन पर उसकी सिफारिशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कारोबारी गतिविधियां कमजोर नियमों वाले देशों की ओर न खिसकें। जी 20 द्वारा स्वागत की गई हालिया थीमैटिक पीयर रिव्यू को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि कई देश अब नीतिगत दस्तावेज़ों से आगे बढ़कर इन मानकों को अपने घरेलू कानूनों, निगरानी ढांचों और लाइसेंसिंग व्यवस्था में लागू कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत नियामक ढांचा अपनाने वाले देश भविष्य में क्रिप्टो नवाचार का लाभ उठाने के साथ-साथ उससे जुड़े जोखिमों को भी बेहतर ढंग से नियंत्रित कर पाएंगे। जी 20 की यह पहल बड़े ऐलानों से ज्यादा अमल पर केंद्रित मानी जा रही है, जहां सिफारिशों को जमीनी स्तर पर लागू करना ही अगली बड़ी चुनौती होगी।
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