प्रयागराज,31 जनवरी (आरएनएस)। गंगा व यमुना जल प्रदूषण निवारण प्रदर्शनी शोध प्रसार प्रकृति संरक्षण एवं पर्यावरण जनजागरण महाभियान के निदेशक सचिव व्यवस्थापक पर्यावरणविद लेखक शिक्षाविद समाजसेवक डा वशिष्ठ नारायण शुक्ल ने शनिवार को कहा कि 1981 से गंगा प्रदर्शनी पर्यावरण संरक्षण के अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करती चली आ रही है। हालांकि जब 1981 में गंगा प्रदर्शनी के कार्यक्रम का शुभारंभ गंगापुत्र वाटरमैन पर्यावरणविद लेखक शिक्षाविद समाजसेवक आचार्य प्रो दीनानाथ शुक्ल दीन द्वारा शुरू किया गया था, तब उस समय नदियों में प्रदूषण न के बराबर था और पर्यावरण भी ज्यादा प्रदूषित नहीं था।
उन्होंने कहा कि उसका कारण भी था कि उस समय ज्यादातर नदियां अविरल थी उन पर ज्यादा बांध नहीं बने थे। इसलिए वह निर्मल थीं तथा गांव शहर हरे भरे वृक्षों से आच्छादित थे, लेकिन प्रोफेसर दीन ने जब यह देखा कि गंगा सहित ज़्यादातर नदियों में गन्दे नाले नालियों का पानी बिना शोधन के डाला जा रहा है, तब उनके मन में आया कि यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो भविष्य में देश की जीवनदायिनी नदियां प्रदूषित हो जाएंगी और तभी से ही उन्होंने माघ मेला में एक भव्य प्रदर्शनी का आयोजन करना शुरू कर दिया जो तक जारी है।
धीरे धीरे कारवां बढ़ता चला गया और फिर तत्कालीन सरकार ने संज्ञान लेते हुए पहले केंद्रीय गंगा प्राधिकरण का गठन किया। बाद में क्रमश: गंगा मंत्रालय बना, मां गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया, उच्च न्यायालय ने गंगा मां को जीवित नदी कह कर? सम्बोधित किया।
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