राणा प्रताप पीजी कालेज में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन
सुलतानपुर,31 जनवरी (आरएनएस)। हमारा इतिहास इस बात की अनुमति नहीं देता कि हम बिना जाने समझे देश में भाषा को लेकर कोई विवाद करें। भारत में पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण कहीं भी भाषाई संवाद में कभी कोई दिक्कत नहीं रही। भारतीय भाषाओं के सह अस्तित्व का सिलसिला बहुत पुराना है। भारतीय भाषा की अवधारणा को ठीक तरह से समझना जरूरी है। यह बातें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के प्रोफेसर निरंजन सहाय ने कहीं। वह राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के विवेकानंद सभागार में भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन प्रथम सत्र को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा निर्गुण आंदोलन व सगुण आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन तक भारत में कभी भी संवाद की भाषा को लेकर कोई विवाद नहीं रहा । आजादी के बाद राजनीतिक कारणों से भाषा विवाद पैदा किए गए। विशिष्ट वक्ता हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गजेंद्र पाठक ने कहा कि विश्व के इतिहास में पहला विश्वविद्यालय भारत में स्थापित हुआ। ईसा से हजारों साल पहले बत्तीस देशों के विद्यार्थी तक्षशिला आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। हजारों साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय में सिंघली और तिब्बती व्याकरण का निर्माण किया गया था । दुनिया के सभी देशों में विश्वविद्यालय तब शुरू हुये जब भारत के विश्वविद्यालय नष्ट हो गए। अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विजय कुमार राय ने कहा अंग्रेजों के आने से पहले भारत में कभी भी भाषा की लड़ाई नहीं थी ।भारत की सभी भाषाओं में एक अंतर्सम्बन्ध हैं। संवेदना के स्तर पर देखें तो सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं। मोहन लाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय राजस्थान के प्रोफेसर सुरेन्द्र कटारिया ने कहा कि विकास के लिए भाषा की भूमिका महत्वपूर्ण है। भाषा के दुरुपयोग के प्रति सजग रहना चाहिए। द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता प्रोफेसर राधेश्याम सिंह ने कहा कि पाश्चात्य चिंतकों कि दृष्टि कभी एकत्ववादी नहीं रही अपनी विभेदकारी सोच के कारण उन्होंने भारतीय भाषाओं में विभाजन के बीज बोये। वरिष्ठ साहित्यकार कमल नयन पाण्डेय ने कहा भाषा का स्वभाव ही साझा होता है। कोई भी जीवित भाषा प्रचलित शब्दों से परहेज नहीं करती । संत तुलसीदास पीजी कालेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ सतीश कुमार सिंह ने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य की अंतरात्मा एक जैसी है। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ.एम.पी.सिंह संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि व आभार ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक प्रोफेसर इन्द्रमणि कुमार ने किया। प्राचार्य प्रोफेसर दिनेश कुमार त्रिपाठी ने अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह व पुष्पगुच्छ देकर मंचस्थ अतिथियों को सम्मानित किया। इस अवसर पर प्रोफेसर निशा सिंह, प्रोफेसर शैलेन्द्र प्रताप सिंह, प्रोफेसर धीरेंद्र कुमार,प्रोफेसर रंजना पटेल, डॉ आलोक कुमार पाण्डेय, डॉ विभा सिंह, डॉ ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह, यशस्वी प्रताप सिंह, अभिषेक शुक्ल समेत अनेक महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। विभिन्न सत्रों में डॉ अखिलेश सिंह, डॉ संतोष अंश, श्रीकांत सिंह, वीरेंद्र गुप्ता आदि ने शोधपत्र प्रस्तुत किया।
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