नई दिल्ली 12 Feb, (rns) : सूचना का अधिकार (RTI) कानून को सरकार में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का सशक्त माध्यम माना जाता है, लेकिन ताजा आंकड़े इसकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, देश के कई प्रमुख सरकारी संस्थानों ने बड़ी संख्या में आरटीआई आवेदन खारिज किए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट ने 2089 आरटीआई आवेदनों में से 22.88 प्रतिशत आवेदन अस्वीकार किए, जो शीर्ष 20 संस्थानों में सबसे अधिक है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 5017 में से 689 आवेदन (13.73%) ठुकराए।
गृह मंत्रालय (MHA) ने 58,130 आवेदनों में से 7750 आवेदन (13.33%) खारिज किए, जो बड़े मंत्रालयों में सबसे अधिक अस्वीकृति दर है।
वित्त मंत्रालय ने 2,20,283 आरटीआई आवेदनों में से 18,734 (8.50%) को अस्वीकार किया।
इसके अलावा, कानून मंत्रालय की अस्वीकृति दर 7.14% रही, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने 7.98% आवेदन खारिज किए।
आंकड़ों ने सूचना के अधिकार कानून की पारदर्शिता और उसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील मामलों में जानकारी रोकना आवश्यक हो सकता है, वहीं अत्यधिक अस्वीकृति दर नागरिकों के अधिकारों को सीमित कर सकती है।
सूचना का अधिकार कानून 2005 का उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को सशक्त बनाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संस्थानों में पारदर्शिता का स्तर समान है या नागरिकों के लिए सूचना पाना अभी भी चुनौती बना हुआ है?

