सुलतानपुर 23 फरवरी (आरएनएस )। अल्लाह से अपने रिश्ते को और मजबूत करने का नाम है रमज़ान। यह पवित्र महीना एक ऐसा अवसर है जिसमें इंसान अपनी जि़ंदगी को अल्लाह की इबादत और आज्ञा-पालन में गुज़ारता है ताकि वह अल्लाह से अपने संबंध को और गहरा कर सके। यह केवल भूख और प्यास सहने का नाम नहीं, बल्कि आत्म-संयम, चरित्र-निर्माण और आंतरिक शुद्धि का एक विशेष अवसर है।
रमज़ान का रोज़ा केवल खाने-पीने से बचने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह इंसान को आत्म-नियंत्रण और अनुशासन की शिक्षा देता है। एक सच्चे रोज़ेदार के हाथ किसी को कष्ट नहीं पहुँचाते, उसकी ज़ुबान किसी को बुरा नहीं कहती, उसके पाँव गलत रास्तों पर नहीं चलते, उसकी आँखें बुरी चीज़ों को नहीं देखतीं और उसके कान बुराइयों को नहीं सुनते। रोज़ा हमें धैर्य, सहानुभूति और दूसरों की तकलीफ़ों को समझने का पाठ पढ़ाता है। रमज़ान गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने की प्रेरणा भी देता है। इस महीने में मुसलमान न केवल अपने लिए बल्कि समाज के अन्य लोगों के लिए भी भलाई के कार्य करते हैं। ज़कात और सदक़ा देने का महत्व रमज़ान में और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह महीना अल्लाह की रहमत, मग़फिरत और नेकियों के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है।
अगर इंसान अपने आपको बुराइयों से बचाने में सफल हो जाता है और अच्छे कर्म करता है, तो उसका रोज़ा अल्लाह की बारगाह में स्वीकार किया जाता है। रमज़ान आत्म-सुधार का महीना है, जो हमें संयम, सहनशीलता, दया और ईमानदारी का पाठ सिखाता है। इस महीने की असली सीख यह है कि इंसान अपने अंदर अच्छाइयों को विकसित करे और बुरी आदतों को छोड़कर खुद को एक बेहतर इंसान बनाए, ताकि अल्लाह उससे राज़ी हो जाए और उसे दुनिया और आखऱित में कामयाबी मिले।

