—- 700 छात्रों के भविष्य को लेकर, कुशीनगर की शिक्षा व्यवस्था कटघरे में।
कुशीनगर, 23 फरवरी (आरएनएस)। आखिरकार उन 700 इंटरमीडिएट छात्रों का साल किसकी लापरवाही ने निगल लिया गया? जब कॉलेज में नियमित प्रधानाचार्य तैनात थे तो फिर अलग से नोडल अधिकारी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? और उससे भी बड़ा सवाल प्रधान लिपिक को नोडल का सहयोग करने के लिए डीआईओएस कार्यालय ने किस मंशा से नामित किया? क्या यह महज प्रशासनिक औपचारिकता थी या फिर जिम्मेदारियों का ऐसा जाल। जिसमें अंतत: 700 छात्रों का भविष्य फंस गया? जब फार्म पर नोडल अधिकारी का हस्ताक्षर अनिवार्य थे तो बिना सही दस्तखत के फार्म बोर्ड तक पहुंच कैसे गया? जब फीस ली गई तो समय से जमा क्यों नहीं किया गया? और यदि डीआईओएस कार्यालय में जांच की व्यवस्था है, तो यह भारी गड़बड़ी पहले क्यों नहीं पकड़ी गई? यह सवाल हैं जो आज परीक्षा से वंचित बच्चों के अभिभावको सहित पूरे जनपद के जागरूक लोग शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।
उक्त मामला पडरौना नगर के गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज का है। जहां से इस वर्ष करीब 700 छात्र बोर्ड परीक्षा से जिम्मेदारो की गैरजिम्मेदाराना कार्य प्रणाली के कारण परीक्षा से वंचित हो गये। आरोपों के केंद्र में कॉलेज के प्रधान लिपिक ज्ञान प्रकाश पाठक, नोडल अधिकारी विकास मणि और डीआईओएस श्रवण गुप्ता की कार्यप्रणाली है। बताया जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज में पहले से नागेश्वर चतुर्वेदी प्रधानाचार्य के रुप में मौजूद थे, फिर भी नोडल अधिकारी की नियुक्ति की गई। नियमों के मुताबिक बोर्ड परीक्षा फार्म पर नोडल अधिकारी के हस्ताक्षर अनिवार्य थे, लेकिन फार्म पर हस्ताक्षर लिपिक द्वारा किए गए जो स्पष्ट रूप से नियम विरुद्ध है। यदि प्रधानाचार्य मौजूद थे तो नोडल की भूमिका क्या थी? और यदि नोडल नियुक्त किए गए थे तो प्रधान लिपिक को सहयोगी बनाकर जिम्मेदारी की रेखाएं धुंधली क्यों की गईं? यही धुंधलापन आगे चलकर 700 छात्रों के लिए घातक साबित हुआ है।
जानकारो का कहना है कि बोर्ड को फार्म भेजने से पहले डीआईओएस कार्यालय में जांच की प्रक्रिया होती है। यदि समय रहते यह जांच प्रभावी ढंग से हुई होती, तो नोडल के बजाय लिपिक के हस्ताक्षर की त्रुटि उसी समय सामने आ सकती थी और तब फार्म को दुरुस्त कराकर छात्रों का साल बचाया जा सकता था। इतना ही नहीं, बोर्ड से निर्धारित शुल्क के सापेक्ष कई गुना अधिक छात्रो से फीस वसूल की गई, फिर समय से बोर्ड खाते में शुल्क जमा क्यो नहीं हुआ? इस पर भी डीआईओएस कार्यालय की ओर से कोई सख्त रिमाइंडर या निगरानी नहीं दिखी।
इनसेट– सवाल जनप्रतिनिधियों से– 700 छात्रों का एक वर्ष बर्बाद होना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं है बल्कि सामाजिक अन्याय है। बावजूद इसके इस गंभीर मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों द्वारा मुखर होकर छात्रो के साथ खडा न होना और प्रशासन से सवाल न पूछना अपने आप में सवाल बना हुआ है। ऐसे मे छात्रों के हित मे आवाज उठाने की जिम्मेदारी किसकी है?।
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