रामानुजगंज, 25 फरवरी (आरएनएस)। ग्राम भवरमॉल निवासी 49 वर्षीय शिक्षक प्रमोद पाठक की जीवन यात्रा साहस, धैर्य और अटूट विश्वास की प्रेरक कहानी बन गई है। वर्ष 2013 में दवाइयों के ओवरडोज के कारण उनकी दोनों किडनियां फेल हो गईं। अचानक आई इस गंभीर बीमारी ने पूरे परिवार को गहरे संकट में डाल दिया, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी।
गंभीर स्थिति के बाद उनका उपचार लखनऊ स्थित स्ड्डठ्ठद्भड्ड4 त्रड्डठ्ठस्रद्धद्ब क्कशह्यह्लद्दह्म्ड्डस्रह्वड्डह्लद्ग ढ्ढठ्ठह्यह्लद्बह्लह्वह्लद्ग शद्घ रूद्गस्रद्बष्ड्डद्य स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य (पीजीआई) में शुरू हुआ। डॉक्टरों की निगरानी में वे लगातार 6 वर्षों तक डायलिसिस पर रहे। इस दौरान करीब 200 बार डायलिसिस कराया गया। सप्ताह में कई-कई बार मशीनों के सहारे जीवन जीना आसान नहीं था, लेकिन प्रमोद पाठक ने अपने चेहरे की मुस्कान कभी गायब नहीं होने दी।
आर्थिक संकट, लेकिन नहीं टूटा हौसला
लंबे इलाज के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति डगमगा गई। इलाज में लाखों रुपये खर्च हुए और परिवार कर्ज के बोझ तले दब गया। इसके बावजूद परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी। हर दिन जिंदगी और मौत के बीच जंग जैसा था, कई बार स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति ने उन्हें संभाले
रखा।
2019 में मिला नया जीवन
आखिरकार वर्ष 2019 में जनसहयोग और परिजनों के समर्थन से उनका किडनी ट्रांसप्लांट संभव हो सका। इस कठिन समय में उनकी पत्नी सरोजिनी पाठक ने आगे बढ़कर पति को अपनी किडनी दान दी। पत्नी के इस त्याग और प्रेम ने प्रमोद पाठक को नया जीवन दे दिया।
ट्रांसप्लांट के दौरान भी कई बार गंभीर परिस्थितियां बनीं, लेकिन डॉक्टरों की मेहनत और परिवार की प्रार्थनाओं ने रंग दिखाया। सफल ऑपरेशन के बाद धीरे-धीरे उनकी सेहत में सुधार होने लगा।
आज पूर्णत: स्वस्थ, आदर्श शिक्षक और समाज के लिए प्रेरणा
किडनी ट्रांसप्लांट के 7 वर्ष पूरे होने के बाद आज प्रमोद पाठक पूरी तरह स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे न केवल अपने परिवार के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
प्रमोद पाठक को उनके अनुशासन, समर्पण और समर्पित शिक्षण के लिए आदर्श शिक्षक के रूप में जाना जाता है। ट्रांसप्लांट के बाद भी उन्होंने अपने कर्तव्यों और शिक्षण के दायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया और विद्यार्थियों को प्रेरित किया।
उनकी कहानी उन लोगों के लिए संदेश है जो छोटी-छोटी बीमारियों या मुश्किलों में हिम्मत हार जाते हैं। छह वर्षों तक डायलिसिस, 200 से अधिक प्रक्रियाएं, आर्थिक संकट और कई बार जानलेवा परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने धैर्य और विश्वास नहीं छोड़ा।
प्रमोद पाठक कहते हैं कि हिम्मत और सकारात्मक सोच सबसे बड़ी दवा है। वहीं, उनकी पत्नी का त्याग इस बात का उदाहरण है कि सच्चा साथ जीवन के हर कठिन मोड़ पर नई राह दिखाता है।
ग्राम भवरमॉल सहित पूरे क्षेत्र में उनकी जीवटता, संघर्ष और शिक्षण के प्रति समर्पण की चर्चा है। यह कहानी बताती है कि यदि इरादे मजबूत हों और कर्तव्य के प्रति निष्ठा बनी रहे तो इंसान हर कठिनाई पर विजय पा सकता है।
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