रजनीश कपूर
एआई का सबसे घातक प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ रहा है। पहले कलाकार, लेखक और संगीतकार अपनी कल्पना से कृतियां रचते थे। अब मिडजर्नी या डैल-ई जैसे टूल्स प्रॉम्प्ट पर चित्र बना देते हैं, वो भी सुंदरता भरे। लेकिन क्या यह रचनात्मकता है? शिखर सम्मेलन में भारतीय कलाकारों ने प्रदर्शन किया कि एआई जनित कला में आत्मा का अभाव है। यह डेटा पर आधारित नकल मात्र है।
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। स्मार्टफोन से लेकर स्मार्ट होम तक, हर जगह एआई की छाप दिखाई देती है। इस सप्ताह नई दिल्ली में शुरू हुए अंतरराष्ट्रीय एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में विश्व के नेता और विशेषज्ञ इसी पर चर्चा कर रहे हैं। इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य एआई के वैश्विक प्रभावों को समझना और नीतियां बनाना है,
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम एआई को अपनाते हुए अपनी स्वतंत्रता और रचनात्मकता को खो नहीं रहे? एआई ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन साथ ही हमें इतना आश्रित बना दिया है कि बिना इसके सोचना भी मुश्किल हो गया है। सोचने वाली बात यह भी है कि कैसे एआई जीवन को सरल बना रहा है, लेकिन रचनात्मकता को नष्ट कर रहा है।
एआई की निर्भरता अब दैनिक जीवन का हिस्सा बन गई है। कल्पना कीजिए, सुबह उठते ही गूगल असिस्टेंट या सिरी आपको मौसम, ट्रैफिक और समाचार बता देता है। कार्यालय में ईमेल लिखने से लेकर डेटा विश्लेषण तक, चैटजीपीटी जैसे टूल्स सब कुछ तुरंत कर देते हैं। भारत में, जहां डिजिटल इंडिया अभियान ने 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता पैदा किए हैं, एआई आधारित ऐप्स जैसे उबर, जोमैटो, ब्लिंकिट आदि ने जीवन को अभूतपूर्व सरलता प्रदान की है।
दिल्ली में हुआ अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में अमेरिकी विशेषज्ञों ने बताया कि एआई ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में 15 ट्रिलियन डॉलर का योगदान दिया है, लेकिन यह निर्भरता खतरनाक साबित हो रही है। एक सर्वे के अनुसार, 70त्न युवा बिना एआई टूल्स के रिसर्च नहीं कर पाते। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब बिजली चली जाए या इंटरनेट कनेक्टिविटी बाधित हो जाए तो लोग हतप्रभ रह जाते हैं।
यह निर्भरता शिक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक दिखाई दे रही है। छात्र अब निबंध लिखने के बजाय एआई से कॉपी-पेस्ट कर लेते हैं। कोटा के कोचिंग संस्थानों से लेकर आईआईटी तक, एआई टूल्स ने होमवर्क को आसान बना दिया, लेकिन समझ की गहराई कम कर दी। शिखर सम्मेलन के एक सत्र में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि एआई जनित सामग्री से छात्रों की आलोचनात्मक सोच 30त्न घटी है। भारत में एनसीईआरटी ने एआई उपयोग पर दिशानिर्देश जारी किए हैं, लेकिन फि़लहाल इसका अमल कमजोर है। परिणामस्वरूप, आने वाली पीढ़ी समस्या-समाधान के बजाय ‘प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंगÓ सीख रही है, यानी एआई को सही सवाल कैसे पूछें। यह निर्भरता मानसिक आलस्य को जन्म दे रही है, जहां स्वयं सोचने की क्षमता क्षीण हो रही है।
एआई का सबसे घातक प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ रहा है। पहले कलाकार, लेखक और संगीतकार अपनी कल्पना से कृतियां रचते थे। अब मिडजर्नी या डैल-ई जैसे टूल्स प्रॉम्प्ट पर चित्र बना देते हैं, वो भी सुंदरता भरे। लेकिन क्या यह रचनात्मकता है? शिखर सम्मेलन में भारतीय कलाकारों ने प्रदर्शन किया कि एआई जनित कला में आत्मा का अभाव है। यह डेटा पर आधारित नकल मात्र है। उदाहरणस्वरूप, बॉलीवुड में एआई स्क्रिप्ट राइटर आ रहे हैं, जो पुरानी फिल्मों के पैटर्न दोहराते हैं। नतीजा? नवीनता का लोप। एक अध्ययन बताता है कि एआई सहायता से बनी कहानियां 40त्न कम मूल होती हैं। लेखन में भी यही समस्यादिखाई दी जाती है। एआई से उत्पन्न संपादकीय या कविताएं सतही लगती हैं, क्योंकि उनमें व्यक्तिगत अनुभव का पुट नहीं।
रचनात्मकता नष्ट होने का एक कारण एआई की ‘परफेक्शनÓ है। यह त्रुटिरहित उत्तर देता है, जिससे मानव प्रयास कमजोर लगने लगते हैं। कल्पना कीजिए एक चित्रकार को, वह घंटों ब्रश चलाता है, गलतियां सुधारता है और यही प्रक्रिया रचनात्मकता को परिपक्व बनाती है। परंतु एआई में यह संघर्ष नहीं होता। शिखर सम्मेलन के दौरान रिलीज हुई एक रिपोर्ट में कहा गया कि एआई ने वैश्विक पेटेंट आवेदनों में 25त्न वृद्धि की, लेकिन अधिकांश ‘इंक्रीमेंटलÓ हैं, यानी नई खोजें कम हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां स्टार्टअप संस्कृति फल-फूल रही है, एआई निर्भरता नवाचार को कुचल सकती है। उदाहरण के तौर पर, फिनटेक क्षेत्र में एआई एल्गोरिदम ऋण स्वीकृति करते हैं, लेकिन सृजनात्मक समाधान गायब हैं।
इसके अलावा, एआई नैतिक दुविधाओं को भी जन्म दे रहा है। डीपफेक वीडियो से राजनीतिक हेरफेर भी हो रहे हैं। 2024 के अमेरिकी चुनावों में एआई ने काफ़ी अफवाहें फैलाईं। इसे देखते हुए भारत में भी आगामी चुनावों से पहले सतर्कता बरतना सार्थक बन जाता है। शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने एआई के ‘जिम्मेदार उपयोगÓ पर जोर दिया, लेकिन निर्भरता रोकने के उपाय कम चर्चित हुए। क्या हम एआई को मास्टर बना लेंगे?
एआई की निर्भरता का एक नमूना आज हर घर में दिखाई देता है। बच्चे आजकल हर ज़रूरत का सामान ऑनलाइन मंगवा लेते हैं। दुकान पर जाए बिना, किसी वस्तु की गुणवत्ता व मोल-भाव का युग अब बहुत कम दिखाई देता है। मुझे याद है हमारे बचपन में हमें बाज़ार भेजा जाता था और किसी भी वस्तु को खरीदने के बाद सही हिसाब से बच्चे हुए पैसे वापिस लेने में जो संतोष मिलता था उसका अपना ही आनंद था। परंतु आजकल के बच्चों में यह दिखाई नहीं देता।
ऐसे में इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, शिक्षा में एआई को सहायक न मानकर चुनौती बनाएं। स्कूलों में ‘एआई-मुक्तÓ घंटे रखें, जहां बच्चे स्वयं रचें। दूसरा, नीतियां बनाएं; जैसे यूरोप का जीडीपीआर, जो एआई पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। भारत को शिखर सम्मेलन से प्रेरणा लेनी चाहिए और ‘एआई साक्षरताÓ अभियान चलाना चाहिए। तीसरा, रचनाकारों को प्रोत्साहित करें, उन्हें सरकारी अनुदान दें जो एआई-रहित कला को बढ़ावा दें। व्यक्तिगत स्तर पर, हमें ‘डिजिटल डिटॉक्सÓ को भी अपनाना होगा। एआई जीवन का हिस्सा बने रहना चाहिए, लेकिन इस पर निर्भरता और रचनात्मक विनाश को रोकना होगा। रचनात्मकता मानव का मूल गुण है, इसे बचाना हमारा कर्तव्य है।
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