० बंदूक छोड़ी, मुख्यधारा चुनी — माओवादी कैडरों की मुख्यधारा में वापसी
० शांति की राह चुनी: माओवादी कैडरों ने बंदूक छोड़कर विकास का मार्ग अपनाया
जगदलपुर, 07 मार्च (आरएनएस)। दिनांक 07 मार्च 2026 को तेलंगाना में सीपीआई (माओवादी) के 130 कैडरों का आत्मसमर्पण, दंडकारण्य विशेष जोनल कमेटी और तेलंगाना राज्य कमेटी क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के जारी प्रयासों में एक महत्वपूर्ण विकास को दर्शाता है। हिंसा का मार्ग त्यागकर मुख्यधारा में लौटे इन कैडरों ने 124 हथियारों के साथ बड़ी मात्रा में गोला-बारूद भी सुरक्षा बलों के समक्ष जमा कराया, जो माओवादी संगठन को लगे बड़े झटके को दर्शाता है। वरिष्ठ पीएलजीए माओवादी कमांडरों तथा महत्वपूर्ण संरचनाओं से जुड़े सदस्यों की आत्मसमर्पण स्पष्ट रूप से सीपीआई (माओवादी) के संगठनात्मक ढांचे के कमजोर पडऩे को दर्शाती है। यह घटनाक्रम पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड तथा अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में संचालित लगातार और समन्वित सुरक्षा अभियानों का परिणाम है। लगातार चलाए जा रहे आसूचना आधारित अभियान, सुरक्षा तंत्र के विस्तार तथा दूरस्थ क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस की स्थापना से माओवादी कैडरों की संचालन क्षमता और उनकी आवाजाही पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है। बस्तर क्षेत्र और उससे सटे वन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे सतत और केंद्रित अभियानों ने माओवादी गढ़ों को धीरे-धीरे ध्वस्त किया है तथा उनके संगठनात्मक नेटवर्क को बाधित किया है, जिससे कैडरों पर हिंसा का मार्ग छोडऩे का दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार ने सुरक्षा प्रयासों के साथ-साथ दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विभिन्न विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं को लागू कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, आजीविका के अवसरों तथा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर दिए गए विशेष ध्यान के कारण पहले से अलग-थलग पड़े गांवों तक धीरे-धीरे शासन की पहुँच बढ़ी है। इन प्रयासों ने स्थानीय समुदायों का लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत किया है तथा जनसामान्य के बीच माओवादी प्रचार के प्रभाव को कम किया है। इतनी बड़ी संख्या में माओवादी कैडरों का मुख्यधारा में लौटना इस बात का संकेत है कि माओवादी संगठन के भीतर भी यह समझ विकसित हो रही है कि हिंसा की विचारधारा अब एक बंद गली तक पहुँच चुकी है। यह भी दर्शाता है कि कठोर सुरक्षा कार्रवाई के साथ समावेशी विकास और कल्याणकारी पहलों को मिलाकर अपनाई गई संतुलित रणनीति उग्रवादी आंदोलनों को प्रभावी रूप से कमजोर कर सकती है। जैसे-जैसे शासन की पहुँच बढ़ती जा रही है और सुरक्षा बल उग्रवादी नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं, वैसे-वैसे क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की संभावनाएँ और मजबूत होती जा रही हैं। बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुन्दरराज पटलिंगम ने कहा कि बड़ी संख्या में माओवादी कैडरों और उनके नेतृत्व द्वारा हिंसा का मार्ग त्यागकर मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय दूरस्थ क्षेत्रों में शासन की बढ़ती पहुँच तथा सुरक्षा बलों के लगातार चलाए जा रहे अभियानों के संयुक्त प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों के निरंतर प्रयासों से माओवादी संगठनात्मक ढांचा काफी कमजोर हुआ है और उनके संचालन क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी आई है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि जैसे-जैसे विकास और कल्याणकारी योजनाएँ आंतरिक गांवों तक पहुँचती जाएँगी, वैसे-वैसे क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास का मार्ग और सुदृढ़ होगा।
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