सिलीगुड़ी,07 मार्च (आरएनएस)। बंगाल पहुंचीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छोटे कार्यक्रम स्थल को लेकर जहां नाराजगी जताई वहीं बाद में विधाननगर के बड़े मैदान को देखकर उन्होंने कहा कि यहां आयोजन होता तो लाखों लोग शामिल हो सकते थे। अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी उनके लिए छोटी बहन की तरह हैं और वह उन्हें बहन की तरह ही प्यार करती हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ममता उनसे नाराज हैं, लेकिन इसके बावजूद समझ नहीं आता कि इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के लिए इतनी छोटी जगह क्यों दी गई। राष्ट्रपति ने कहा कि ऐसा लगता है मानो यह सोचा गया हो कि वह छोटे मैदान में आकर कार्यक्रम में शामिल हों और फिर वापस लौट जाएं। उन्होंने यह बातें उस समय कहीं जब वह कॉन्फ्रेंस के बाद दूसरे कार्यक्रम में मौजूद लोगों को संबोधित कर रही थीं।
बताया गया कि फांसीदेवा में आयोजित पहले कार्यक्रम में जगह कम होने के कारण बड़ी संख्या में लोग शामिल नहीं हो पाए थे। इसके बाद जब राष्ट्रपति विधाननगर मैदान पहुंचीं तो उन्होंने वहां के बड़े मैदान को देखते हुए यहहुए यह टिप्पणी की।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को कहा कि देश की स्वतंत्रता संग्राम में संताल समुदाय का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन कई महान व्यक्तित्वों को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। उन्होंने कहा कि अनेक ऐसे वीर रहे जिनके नाम इतिहास में जानबूझकर शामिल नहीं किए गए। उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संताल सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय के लिए यह गर्व की बात है कि लगभग 240 वर्ष पहले उनके पूर्वज तिलका मांझी ने शोषण के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। उनके विद्रोह के लगभग 60 वर्ष बाद वीर भाइयों सिदो-कान्हू और चांद-भैरव के साथ बहादुर बहनों फूलो-झानो ने 1855 में संताल हूल का नेतृत्व किया। राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय के लोगों ने देश के लिए जितना योगदान दिया है, उसे पर्याप्त मान्यता नहीं मिली। उन्होंने कहा कि तिलका मांझी, सिदो-कान्हू और चांद-भैरव जैसे अनेक नाम हैं जो इतिहास में पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाए। यदि उनके योगदान को पूरी तरह शामिल किया जाता तो इतिहास उनके नामों से भरा होता। उन्होंने संताल समुदाय की वीरता की सराहना करते हुए कहा कि संताल लोग हीनता को स्वीकार नहीं करते और अन्याय के खिलाफ डटकर संघर्ष करते हैं। उन्होंने कहा कि संताल एक साहसी और स्वाभिमानी समुदाय है, जिसे अपने गौरवशाली इतिहास पर गर्व होना चाहिए।राष्ट्रपति ने विकास के मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा कि कुछ क्षेत्रों में संताल और अन्य आदिवासी समुदायों तक विकास का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि आदिवासी समाज को शिक्षा, अवसर और विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन में कुछ बाधाएं भी सामने आईं। राष्ट्रपति ने कहा कि जब वह यहां आने की तैयारी कर रही थीं, तब उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि कुछ लोग इस बैठक के आयोजन के पक्ष में नहीं थे। उनके अनुसार ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि संताल समुदाय आगे बढ़े, शिक्षा प्राप्त करे और संगठित होकर मजबूत बने।
राष्ट्रपति मुर्मू ने संताल पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 संताल समुदाय के इतिहास में विशेष रूप से याद किया जाएगा, क्योंकि उसी वर्ष संथाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संविधान का संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि में संस्करण भी जारी किया गया। इस अवसर पर उन्होंने ओल चिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू को भी श्रद्धांजलि दी। राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया, जिससे संथाली भाषा बोलने वालों को अभिव्यक्ति का नया माध्यम मिला। उन्होंने ‘बिदु चंदनÓ, ‘खेरवाल वीरÓ, ‘डालेगे धनÓ और ‘सिदो कान्हू–संताल हूलÓ जैसे नाटकों के माध्यम से साहित्य और सामाजिक चेतना का भी प्रसार किया।
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