-प्रो सदानंद शाही के कविता संग्रह ÓसंगतराशÓ पर केंद्रित Óपुस्तक चर्चा व काव्यपाठÓ का हुआ आयोजन
अयोध्या। जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ फ़ैज़ाबाद द्वारा संयुक्त रूप से बीएचयू के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष और प्रख्यात कवि-लेखक-संपादक प्रो सदानंद शाही के कविता संग्रह ÓसंगतराशÓ पर केंद्रित Óपुस्तक चर्चा और काव्यपाठ का आयोजन जनमोर्चा सभागार में किया गया। इस अवसर पर आत्मवक्तव्य देते हुए प्रो शाही ने कहा कि यह सुखद संयोग है कि लगभग दो दशक पहले उनके पहले संग्रह पर भी इसी शहर में बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में मानवीयता और संवेदना के समक्ष इतने खतरे मौजूद हैं कि कविता की जरूरत अब पहले से भी अधिक है। उन्होंने कहा कि मैं खुद को कविता-संसार का स्थायी नागरिक या विधिवत कवि नहीं मानता लेकिन मैं कविताएं लिखता रहा हूँ। उन्होंने अपने संग्रह ÓसंगतराशÓ के बारे में बात करते हुए कहा कि इसकी प्रतिनिधि कविता के केंद्र में बनारस है, जिसे हम सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जानते हैं; यह बहुत प्राचीन और शायद दुनिया का प्राचीनतम जीवित शहर है लेकिन इसके भीतर भी कई तरह की क्रूरताएं मौजूद हैं जिनपर हमारी दृष्टि कम ही जाती है। इन चीजों की छवियां आपको इस संग्रह की कविताओं में दिखाई पड़ेंगी। उन्होंने कहा कि कविता मुख्य रूप से जीवन यथार्थ पर एक भावात्मक प्रतिक्रिया होती है। कविता को मनुष्यता की मातृभाषा कहा गया है। प्रो शाही ने उपस्थित साहित्यप्रेमियों के समक्ष अपने कविता-संग्रह से ÓसंगमÓ, Óमँझली मामीÓ, ÓसंगतराशÓ, ÓगांधीनामाÓ सहित कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि शाही जी की इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे अपना जीवन याद आता रहा। वरिष्ठ आलोचक रघुवंशमणि ने कहा कि शाही जी एक व्यक्ति, कार्यकर्ता और प्रशासक के रूप में अत्यंत संघर्ष के दौर से गुजरे हैं। वे कई संस्थाओं को निर्मित करने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सत्ता ने मूल्यों को शुद्ध राजनीति से प्रतिस्थापित कर दिया है। ऐसे दौर में ये कविताएँ मानवीय मूल्यों की स्थापना के लक्ष्य की सहायक हैं। ं कवि-प्राध्यापक विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि समय और वर्तमान की वास्तविकताओं के साथ ही अधिक सान्द्र रूप में स्मृति, परम्पराबोध और एक विरल अनुभव संसार प्रो शाही की कविताओं में मौजूद है। वे मुख्यधारा के कवि न होकर समांतर किंतु अधिक मौलिक और सशक्त धारा के कवि हैं। वे प्रोपगैंडा और रूखी विचारबहुल प्रतिबद्धता के कवि न होकर जीवनधारा में चलते हुए हर दिखती हुई चीज़ को प्रेम करते हुए चलने वाले कवि हैं। वरिष्ठ दलित साहित्यकार सी बी भारती ने कहा कि स्त्री विमर्श और मनुष्यत्व की जो शृंखलाएँ हैं वे सब शाही जी कविता में मौजूद हैं। Óमँझली मामीÓ कविता के बिना हिंदी की स्त्रीविमर्शपरक कविता का आकाश संभव नहीं होगा। शाही जी श्रमजीविता और मनुष्यता के पक्षधर कवि हैं और स्वस्थ मानव समाज की निर्मिति के प्रस्तावक हैं। चिंतक-विचारक और प्रलेस के सचिव आर डी आनंद ने कहा कि कवि अत्यंत कोमल हृदय का स्वामी होता है लेकिन अंतत: वह सच्चाई ही लिखता है। उनके अनुसार एक कवि भौतिक पारिस्थितियों के मनोविज्ञान को समझता है। जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष मो जफ़ऱ ने कहा कि यह संग्रह एक विद्वान की भावनात्मक अभिव्यक्ति का परिचायक है। कवि अनिल कुमार सिंह ने कहा कि शाही की कविताओं में मानवीयता और संवेदनशीलता के विविध पक्ष दृष्टिगत होते हैं। कवयित्री पूजा श्रीवास्तव ने प्रो शाही की कविताओं को युवा कवियों के लिए प्रेरक के रूप में रेखांकित किया। इससे पहले कार्यक्रम का संचालन कर रहे शायर और जलेस के कोषाध्यक्ष मुजम्मिल फिदा ने विस्तार से प्रो शाही का परिचय देते हुए उनके संग्रह की खास बातों की ओर इशारा किया। कार्यक्रम संयोजक सत्यभान सिंह जनवादी ने कहा कि प्रो शाही की कविताएं अत्यंत सहज भाषा और भंगिमा लिए हुए होती हैं जिन्हें समझने के लिए किसी बौद्धिक मशक्कत की जरूरत नहीं है। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार आशाराम जागरथ, डॉ परेश कुमार पांडे, राम सुरेश शास्त्री, अशोक कुमार तिवारी, जय प्रकाश श्रीवास्तव, अखिलेश सिंह, रवि शंकर चतुर्वेदी, राजीव श्रीवास्तव, बृजेश श्रीवास्तव, कुमकुम भाग्या, निर्मल गुप्ता, आफाक़ अहमद सहित बड़ी संख्या में साहित्यसुधी, संस्कृतिकर्मी एवं सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
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