पुराने दलों एवं नेताओं का मखौल उड़ाना और उन्हें देश की समस्याओं की जड़ बताना बालेंद्र शाह के रैप गानों का थीम रहा। इस तरह उन्होंने जन भावनाओं को आवाज दी। असर हुआ कि लोगों ने उनको ही समाधान मान लिया है।
नेपाल के चुनाव नतीजों से साफ है कि वहां के लोग पुरानी पार्टियों और नेताओं से कितने आजिज़ आ चुके थे। नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल), और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को उन्होंने सिरे से ठुकरा दिया है। अब उन्होंने अपना दांव ऐसे नेता पर लगाया है, जिन्होंने अपनी पहचान रैप म्यूजिक से बनाई और उसी माध्यम से राजनीति में लोकप्रिय हुए। बालेंद्र शाह पहले अपने दम पर काठमांडू के मेयर बने और अब पिछले सितंबर की उथल-पुथल के बाद हुए चुनाव में लोगों की उम्मीद का सबसे बड़ा प्रतीक बन कर उभरे हैं। शाह के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) नेपाल के हालिया इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब हुई है। शाह ने चुनाव अभियान भी रैपर के बतौर चलाया।
पुराने दलों और नेताओं का मखौल उड़ाना और उन्हें देश की तमाम समस्याओं की जड़ बताना उनके रैप गानों का थीम रहा है। इस तरह उन्होंने लोगों के भावनाओं को आवाज दी। असर हुआ कि लोगों ने उनको ही समाधान मान लिया है। मगर चाहे राजनीतिक संस्कृति से जुड़ी समस्याएं हों या ठोस आर्थिक मसले- उनका समाधान रैप अथवा किसी संगीत से नहीं निकल सकता। इसके लिए ठोस कार्यक्रम एवं योजनाओं की जरूरत होगी। इस मामले में शाह के पास कोई सोच या नजरिया है, इसका कोई संकेत उन्होंने नहीं दिया है।
बल्कि वे एक ऐसी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बतौर जीते हैं, जिसके नेता पर भ्रष्टाचार के इतने गंभीर आरोप हैं कि जेन-जी विद्रोह के पहले तक वे जेल में थे। अपनी खराब छवि के कारण ही रवि लामिछाने ने शाह को पार्टी का चेहरा बनाया। ये दांव कामयाब रहा। लेकिन आगे का रास्ता कठिन है। आरएसपी की सरकार को मतदाताओं की ऊंची उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। बेरोजगारी, युवाओं के सामने अवसरहीनता, गरीबी और आम विकास की कसौटियों पर पिछड़ापन वे समस्याएं हैं, जिनका समाधान नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां नहीं ढूंढ पाईं। इसके लिए प्रयासरत होने के बजाय उनके नेता आलीशान जिंदगी जुटाने में लग गए। क्या आरएसपी उससे अलग संस्कृति और समाधान दे पाएगी, यह अब मुख्य प्रश्न है।

